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Tuesday, May 28, 2013

तृष्णा (लोभ) से अधिक इच्छा नहीं करना चाहिए...

पूर्व काल की बात है, एक मुनि थे। उनके मन में धन की इच्छा जाग उठी। धन जमा करने के लिए वे तरह-तरह के प्रयत्न किया करते परंतु उनका हर प्रयत्न विफल हो जाता।
उनके पास का धन भी खत्म होने लगा था। उन्होनें सोचा जो थोड़ा-सा धन बचा है इससे दो बछड़े खरीद लिए जाए फिर खेती करके खूब धन कमाया जाए। उन्होनें ऐसा ही किया, बछड़े खरीद कर सोचा इन बछड़ो से जुताई का काम ले कर खूब अनाज पैदा कर के बहुत सारा धन कमाऊँगा।
फिर वे बछड़ो को परस्पर जोत कर (साथ में बांधकर) हल चलाने की शिक्षा देने के लिए घर से निकल पड़े। जब गाँव से बाहर निकले तो रास्ते के बीच में एक ऊँट रास्ता घेर कर बैठा था। दोनों बछड़े ऊँट को बीच में कर उसके ऊपर से निकलने लगे, किन्तु ज्यों ही उसकी गर्दन के पास पहुँचें तो ऊँट को बड़ी चुभन मालूम हुई।वह रोष में भरकर हड़बड़ा कर उठ खड़ा हो गया। दोनों बछड़े जो परस्पर बंधे हुए थे ऊँट के दोनों ओर लटक गए। बछड़ों की साँसे रुक गयी और वो मर गए। यह दृश्य मुनि अपनी आँखों के सामने देख रहे थे पर उनके वश में कुछ भी नहीं था।
अतः वे तृष्णा(लोभ) से मुख मोड़कर बोल पड़े- "मनुष्य कितना भी बुद्धिमान क्यूँ न हो पर जो उसके भाग्य में नही है, उसे वो किसी भी प्रयत्न् से प्राप्त नहीं कर सकता, हठपूर्वक किए गए पुरषार्थ से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।"
(नीतिकथाओं से प्रस्तुत)
- साधना

Wednesday, February 6, 2013

आलस्य से पतन होता है

Camel at Gaochang
एक ऊँट था, उसे पूर्वजन्म की सारी बातें याद थी। ऊँट होते हुए भी वह तपस्या में लगा रहता था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे वरदान मांगने को कहा। ऊँट ने कहा- भगवान यदि आप प्रसन्न है तो वर दीजिये कि मेरी गर्दन इतनी लंबी हो जाए की मैं एक स्थान पर बैठा-बैठा सौ मील दूर तक का भोजन खा सकूँ। भगवान ने कहा- 'ऐसा ही होगा।' 
अब ऊँट लंबी गर्दन कर बैठे-बैठे अपना भोजन पा लेता था। इस तरह वह आलस्य की मूर्ति बन बैठा। एक दिन ऊँट बहुत दूर देश में चर रहा था। तभी बारिश आने लगी, बारिश से बचने के लिए ऊँट अपनी गर्दन एक गुफा में डालकर चरने लगा। संयोग से उसी गुफा में भूखा सियार का जोड़ा बैठा था, उन्होने ऊँट की गर्दन को काट-काट कर खाना शुरू कर दिया। जब सौ मील दूर बैठे ऊँट को दर्द महसूस हुआ तो वह अपनी गर्दन समेटने लगा, पर ये संभव न हो सका। इस तरह सियार के काट कर खा जाने से ऊँट की मृत्यु हो गयी। 
इसीलिए हमें आलस्य नहीं करना चाहिए और हमेशा कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि आलस्य ही पतन का कारण होता हैं। 
- (महाभारत से प्रस्तुत नीतिकथा)