Showing posts with label लेख. Show all posts
Showing posts with label लेख. Show all posts

Thursday, December 12, 2013

संगठन में शक्ति होती है

Elephants by the roadside

किसी वन में एक वृक्ष पर गौरैया का एक जोड़ा रहता था। कुछ समय बीतने पर गौरैया ने अंडे दिए, अभी अण्डों से बच्चे निकल भी नहीं पाये थे कि एक मतवाले हाथी ने आकर उस डाली को ही तोड़ डाला जिस पर घोंसला बना था।

गौरैयाका जोड़ा तो किस्मत से बच गया ,पर सारे अंडें फूट गए। गौरैया का जोड़ा दुखी हो रोने लगा, तब पास बैठे कठफोडवा ने उनके दुःख का कारण पूछा। गौरैया ने घौसला हाथी द्वारा तोड़े जाने की बात बताई। कठफोड़वा ने सांत्वना देते हुए कहा "यूँ तो हम हाथी के सामने छोटे से है परन्तु संगठन में शक्ति होती है हम मिलकर हाथी से बदला ले सकते है।"

तब कठफोडवा अपनी मित्र मक्खी व मेंढक के पास गया व हाथी को पराजित करने कि योजना बनाई। योजनानुसार जब हाथी वहाँ से गुजरा तो मक्खी हाथी के कान के पास गुनगुनाने लगी ,हाथी ने मस्ती में आकर अपनी आँखे बंद कर ली। कठफोडवे ने अपनी तेज चोंच से हाथी कि आँखे फोड़ डाली,अँधा हाथी प्यास से व्याकुल हो उठा। तभी मेंढक एक बड़े से गड्ढें के पास जाकर टर्र -टर्र कि आवाज करने लगा। हाथी पानी के भरम में गढ्ढे में जा गिरा और तड़प -तड़प कर मर गया।

अतः नीति बताती है कि समूह में शक्ति होती है। संगठन और समूह -भावना से कार्य करने से बड़े से बड़ा काम सम्भव हो जाता है, और संतोष भी प्राप्त होता है।

- नीतिकथा से प्रस्तुत

टिप्पणी: वर्तमान समय में हमारे परिवार और हमारे राष्ट्र को भी संगठन व समूह-भावना की आवश्यकता है ताकि हम अपने विरोधियों का सामना सशक्त होकर कर सकें और अपने राष्ट्र को मजबूत बना सके।

Saturday, November 2, 2013

यादों की दीपावली

Vandalized Vintage Print, " Childhood Memories" Mike Mozart painted more "Details" into this boring and bizarre vintage Print


          वर्षा ऋतु के समापन के बाद आता है जगमागते दीपों का त्यौहार दीपावली,
परस्पर मेल मिलाप का,मिलकर खुशियाँ मनाने का।पर मुझे लगता है कि दीपावली इन सब ख़ुशियों के साथ ही, पुरानी यादों को ताज़ा करने का।
          बारिश के बाद जब हम पुरानी अलमारी में रखे कपड़ों की नमी दूर करने 
के लिए धूप में डालते हैं, तब बच्चे हों या बड़े सभी थोड़ी थोड़ी देर में कहते नज़र आते हैं, कि अरे ये तो मेरा वो वाला शर्ट हैं जो मेरी नानी या दादी ने मुझे मेरे जन्म दिन पर दिया था। ये जींस पापा मेरे लिए मुम्बई से लाये थे, ये फ्रॉक मेरे बचपन की है जो मामाजी ने दिलाई थी। ऐसी बातें पूरे समय होती रहतीं हैं।
          विशेषकर जो माँ होती है, उनकी यादों का खज़ाना तो खुल जाता है। जब बेटा बेटी के छोटे-छोटे स्वेटर, मोज़े, पायजामे आदि कपड़े हाथों में आते हैं तो तब आँखों के सामने वे सारे दृश्य चलचित्र की भांति घूमने लगते हैं जब उन्होंने अपने ममता भरे हाथों से उन्हें बनाया था।
          इस कपड़ों को गठरी से निकाल कर धूप में सुखाना और फिर यत्न से वापस रखना एक अदभुत अनुभूति होती है, इसी समय सबकी बातें भी सुननी पड़ती हैं कि क्या जरुरत हैं इन पुरानी चीजों को संभाल कर रखने की, किसी गरीब को दे दो । पर पुरानी यादों को जीवित रखने के लिए , सबकी बातों को अनसुना कर माँ फिर उन कपड़ों और वस्तुओं को सहेज कर वापस अलमारी रख देती है, अपनी उन यादों की धरोहरों को, फिर से अगले वर्ष धूप में सुखाने को....... 

                                                                                       साधना 

Thursday, October 10, 2013

माँ भ्रामरी देवी की कथा


पूर्व समय की बात है, अरुण नाम का एक दैत्य था। वह बड़ा नीच था, उसके मन में देवताओं को जीतने की इच्छा उत्पन्न हो गई। उसने कठोर तप किया, तब उसके शरीर से प्रचंड अग्नि निकली, जिससे सभी प्राणियों के मन में आतंक छा गया। उसकी  कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे वर मांगने को कहा। अरुण ने जब आँखे खोली, तो सामने ब्रह्माजी को पाया। उसने ब्रह्माजी से वर माँगा ''मैं कभी मरुँ नहीं '' ब्रह्माजी  ने समझाया जन्म लेने वाले का मरना निश्चित है, यही जीवन का सिद्धांत है। तुम कोई दूसरा वर मांग लो।

तब अरुण ने कहा -''प्रभो अच्छी बात है, फिर आप मुझे ऐसा वरदान दीजिये कि मैं न युद्ध में मरुँ, न किसी अस्त्र -शस्त्र से, न स्त्री-पुरुष से, न ही दो पैर, चार पैर वाले प्राणी मुझे मार सके और मुझे ऐसा बल दीजिये कि मैं समस्त देवताओं को जीत सकूँ। तब ब्रह्माजी तथास्तु कह कर ब्रह्मलोक को चले गए। दैत्य अरुण ने अपने बल से सभी लोकों पर विजय प्राप्त की और सभी को सताने लगा। समस्त देवता अरुण से व्यथित होकर उसे परास्त करने का विचार करने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि तुम सभी भगवती की आराधना करो, वे ही तुम्हारा कार्य सिद्ध करेंगी, साथ ही दैत्य अरुण को गायत्री जप से विरत करना होगा।

तब ब्रहस्पति जी ने मायाबीज का जप करके तपस्या पूर्ण की, जिससे उन्हें तेज और शक्ति पुनः प्राप्त हुई। तत्पश्चात वे दैत्य अरुण के पास जाकर बोले - जिन देवी की तुम उपासना करते हो, मैं भी उन्ही की उपासना करता हूँ। बल के अभिमान और देव माया से मोहित होकर अरुण कहने लगा - आज से मैं गायत्री की उपासना नहीं करूँगा और उसने तपस्या करना छोड़ दिया। गायत्री जप का त्याग करते ही अरुण निस्तेज हो गया। कुछ समय बीतने के बाद जगत का कल्याण करने वाली माँ भगवती जगदम्बा प्रगट हुई। उनके श्रीविग्रह से करोड़ों सूर्यों का प्रकाश फ़ैल रहा था, उनकी मुठ्ठी में अद्भुत भ्रमर भरे हुए थे। सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की। देवी ने उन भ्रमरों को चारों और फैला दिया, उन सभी भ्रमरों ने जाकर राक्षसों की छाती छेद डाली। इस तरह ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि न युद्ध हुआ, न किसी की परस्पर बातचीत हुई और शक्तिशाली दानव नष्ट हो गए। इस प्रकार माँ भ्रामरी देवी का प्रादुर्भाव हुआ।
 
- धार्मिक ग्रंथों से प्रस्तुत

Thursday, September 12, 2013

मित्र की पहचान

Wrestling with a trained bear / Lutte avec un ours dressé

दो मित्र थे। एक दिन दोनों भ्रमण के लिए निकले। सँयोगवश उसी समय वहाँ एक भालू आ गया। एक मित्र भालू को देखते ही अत्यन्त भयभीत हो कर, दूसरे मित्र की परवाह किये बिना ही भाग कर निकट के पेड़ पर चढ़ गया। दूसरा मित्र अकेले भालू के साथ लड़ना असम्भव जानकर मुर्दे के समान धरती पर सो गया।

उसने पहले से सुन रखा था कि भालू मरे हुए आदमी को हानि नहीं पहुँचाता है। भालू ने आकर उसके नाक, कान, मुख, आँख, तथा सीने की परीक्षा की और उसे मरा हुआ समझ कर चला गया।

भालू के जाने के बाद पहला मित्र पेड़ से नीचे उतरा। उसने मित्र से जाकर पूछा -भाई ,भालू तुम्हारे कान में क्या कह रहा था। मैंने देखा कि वह बड़ी देर तक तुम्हारे कान से अपना मुख लगाये हुए था। दूसरा मित्र बोला -भालू मुझे यह कह गया कि 
"जो मित्र संकट के समय छोड़ कर भाग जाता है उसके साथ फिर कभी भी मित्रता नहीं रखना चाहिए।"
- नीतिकथा से प्रस्तुत

Sunday, August 4, 2013

चिरकारी की कथा

The Thinker

महर्षि गौतम का एक महान ज्ञानी पुत्र था। उसका नाम था चिरकारी। वह किसी भी कार्य को करने से पहले उस पर देर तक विचार किया करता था। सोचने की आदत के कारण हर काम में देर हो जाती थी, इसलिए लोग उसे आलसी व मंदबुद्धि कहते थे।

एक दिन की बात है, महर्षि गौतम की स्त्री से एक महान अपराध हो गया। जब ऋषि को पता चला तो वे बहुत कुपित हुए और अपने पुत्र को कहा कि ''बेटा, तू अपनी दुष्कर्मा माता का वध कर डाल।" इस प्रकार बिना विचार किय, ऋषि अपने पुत्र को आदेश देकर स्वयं वन को चले गए।

चिरकारी ने बहुत अच्छा कह कर पिता की आज्ञा को स्वीकार कर लिया। पर अपने स्वभाव के अनुसार वह सोचता रहा। उसने सोचा पिता की आज्ञा का पालन करूँ या माता की रक्षा। पिता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का परम धर्म है और माता की रक्षा करना भी प्रधान धर्म है। उसे कभी पिता का पक्ष उचित लगता तो कभी माता का पक्ष। चिरकारी इसी उलझन में पड़ा रहा।

उधर वन में जब ऋषि का क्रोध शांत हुआ तो उन्हें अपने अनुचित निर्णय पर बहुत पछतावा हुआ, वे पत्नी की वध की कल्पना कर रो पड़े। मन ही मन पछताने लगे कि ''आज मेरे अविवेक ने महान अनर्थ कर डाला ,मेरी पत्नी तो निर्दोष है। फिर उन्हें अपने पुत्र के स्वभाव का ध्यान आया। वे सोचने लगे यदि मेरे पुत्र ने आज विलम्ब किया होगा तो मैं स्त्री-हत्या के दोष से बच जाउँगा। जब वे आश्रम पहुंचे तो पुत्र को खड़ा पाया, चिरकारी ने हथियार फेंक कर पिता के चरणों को पकड़ लिया और आज्ञा के पूर्ण न कर पाने की क्षमा मांगी। इतने में ऋषि ने अपनी पत्नी को आते देखा। पत्नी को देख गौतम ऋषि की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रही।

उन्होने पुत्र को गले से लगा कर कहा "बेटा तुम्हारे स्वभाव के कारण मैं महान अनर्थ से बच  गया।" तब ऋषि ने नीति का उपदेश देते हुए कहा "हर कार्य को बहुत सोच-समझ कर करना चाहिए। चिरकाल तक सोच-समझ कर किया हुआ काम हमेशा अच्छा फल ही देता है।
- नीतिकथा से प्रस्तुत

Wednesday, July 17, 2013

परिहास का दुष्परिणाम

Brahmasarovar, Kurukshethra

द्वारका के पास वन में घूमते हुए कुछ ऋषि आ गए। वे महापुरुष केवल भगवत चर्चा करते हुए अपना जीवन व्यतीत करते थे। उसी वन में यदुवंश के राजकुमार भी खेलने-कूदने के लिए निकले थे। वे सभी युवक थे ,स्वछन्द व बलवान थे। ऋषियों को देख कर यादव कुमारों के मन में परिहास करने की सूझी।

जाम्बवती-नंदन साम्ब को सबने साड़ी पहनाई, उसके पेट पर कपडा बांध दिया। उन्हें साथ ले कर ऋषियों के पास गए। साम्ब ने घूँघट निकाल कर मुख छुपा रखा था। साथियों ने ऋषियों से बनावटी नम्रता से प्रणाम करके पूछा "यह सुन्दरी गर्भवती है और जानना चाहती है कि उसके गर्भ से क्या उत्प्पन होगा। आप सभी सर्वज्ञ है ,भविष्यदर्शी है आप कुछ बताने की कृपा करें।" अपनी शक्ति का उपहास होते देख सभी मुनिगन क्रुद्ध हो गए। उन्होने कहा "मूर्खों अपने पूरे कुल का नाश करने वाला मूसल उत्पन्न करेगी ये।"

भयभीत राजकुमार घबराकर वहा से लौट गए। साम्ब के पेट पर बन्धा वस्त्र खोला तो उसमे से लोहे का एक मूसल निकला। अब कोई उपाय तो था नहीं, यादव कुमार राजसभा में आये और सारा प्रसंग राजा उग्रसेन को बता दिया। महाराज की आज्ञा से उस मुसल को कूट-कूट कर चूर्ण बना दिया गया और बचे हुए लोहे के टुकड़े को समुद्र में फेंक दिया गया।

मुनियों के श्राप से वह लोहे का चूर्ण घास के रूप में उग गया। समुद्र में फेंके गए टुकड़े को एक मछली ने निगल लिया। वह मछली मछुआरे द्वारा पकड़ ली गई। मछली के पेट से निकले लोहे के उस टुकड़े से बाण की नोक बन गई। वही बाण श्रीकृष्ण के चरण में लगा, और यादव-वीर समुद्र-तट पर परस्पर एक दूसरे से ही युद्ध करने लगे, शस्त्र ख़त्म होने पर घास से ही आघात करने लगे। इस प्रकार एक विचारहीन परिहास के कारण यदुवंश नष्ट हो गया।
- धार्मिक ग्रंथ से प्रस्तुत

Tuesday, July 2, 2013

युक्ति शारीरिक बल से श्रेष्ठ होती है

King Cobra

किसी वन में एक विशाल बरगद का पेड़ था। उसकी घनी शाखाओं पर अनेक पक्षी रहते थे। वहीं एक कौवे का जोड़ा भी रहता था। उसी पेड़ के खोखले तने में एक काला साँप भी रहता था। जब भी मादा कौवा अंडे देती, वह साँप उन्हें खा जाता था। कौवे के अंडे खा जाना उसका स्वभाव बन गया था। एक दिन कौवे का जोड़ा अपने मित्र सियार के पास गया और अपना दुखड़ा सुनाया। सारी बातें सुनकर सियार भी बहुत दुखी हुआ और बोला - "मित्र, चिंता करने से कुछ नहीं होगा। हम उस दुष्ट सर्प से शारीरिक बल से तो नहीं जीत पाएंगे, पर उपाय करने से तुम्हारा शत्रु मारा जाएगा।" कौवे के जोड़े ने कहा- "मित्र जल्दी से उपाय बताओ"। सियार ने कहा "तुम किसी राजा की राजधानी में चले जाओ, वहाँ से किसी धनी व्यक्ति का सोने का हार लाकर उस दुष्ट सर्प के बिल में डाल देना। उस हार को ढूंढते-ढूंढते राज-सेवक आएँगे और इस प्रकार तुम्हारा दुश्मन मारा जाएगा"।

यह सुनकर कौवे का जोड़ा नगर की और उड़ गया। वहां तालाब के किनारे राजकुमारी जल-क्रीड़ा कर रही थी। कौवे ने झपट्टा मार कर सोने का हार उठा लिया और ले जाकर पेड़ के खोखले तने में डाल दिया और खुद दूसरे पेड़ पर जा कर बैठ गया। राज-कर्मचारिओं  ने कौवे को हार खोखले तने में डालते देख लिया था। जब वे वहाँ पहुचें तो उन्हें फ़न उठाये सर्प दिखाई दिया। फिर क्या था उन सभी ने मिल कर सर्प को मार डाला। सियार के बुद्धि-चातुर्य से कौवे का जोड़ा सुखी हो कर आनन्द पूर्वक रहने लगा।

इसीलिये कहा गया है कि "बलवान को युक्ति से ही जीतना चाहिए"।

- पंचतंत्र से प्रस्तुत 

Tuesday, May 28, 2013

तृष्णा (लोभ) से अधिक इच्छा नहीं करना चाहिए...

पूर्व काल की बात है, एक मुनि थे। उनके मन में धन की इच्छा जाग उठी। धन जमा करने के लिए वे तरह-तरह के प्रयत्न किया करते परंतु उनका हर प्रयत्न विफल हो जाता।
उनके पास का धन भी खत्म होने लगा था। उन्होनें सोचा जो थोड़ा-सा धन बचा है इससे दो बछड़े खरीद लिए जाए फिर खेती करके खूब धन कमाया जाए। उन्होनें ऐसा ही किया, बछड़े खरीद कर सोचा इन बछड़ो से जुताई का काम ले कर खूब अनाज पैदा कर के बहुत सारा धन कमाऊँगा।
फिर वे बछड़ो को परस्पर जोत कर (साथ में बांधकर) हल चलाने की शिक्षा देने के लिए घर से निकल पड़े। जब गाँव से बाहर निकले तो रास्ते के बीच में एक ऊँट रास्ता घेर कर बैठा था। दोनों बछड़े ऊँट को बीच में कर उसके ऊपर से निकलने लगे, किन्तु ज्यों ही उसकी गर्दन के पास पहुँचें तो ऊँट को बड़ी चुभन मालूम हुई।वह रोष में भरकर हड़बड़ा कर उठ खड़ा हो गया। दोनों बछड़े जो परस्पर बंधे हुए थे ऊँट के दोनों ओर लटक गए। बछड़ों की साँसे रुक गयी और वो मर गए। यह दृश्य मुनि अपनी आँखों के सामने देख रहे थे पर उनके वश में कुछ भी नहीं था।
अतः वे तृष्णा(लोभ) से मुख मोड़कर बोल पड़े- "मनुष्य कितना भी बुद्धिमान क्यूँ न हो पर जो उसके भाग्य में नही है, उसे वो किसी भी प्रयत्न् से प्राप्त नहीं कर सकता, हठपूर्वक किए गए पुरषार्थ से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।"
(नीतिकथाओं से प्रस्तुत)
- साधना

Tuesday, May 21, 2013

सोच...

Tiger Girl


एक छोटी-सी बच्ची थी। उसे रोज रात को सपने में शेर दिखाई देता था। धीरे-धीरे बच्ची के मन में डर बैठ गया। वह पूरे समय अनजाने डर से डरती ही रहती थी। उसके माता-पिता उसे एक मनोचिकित्सक के पास ले गए।
मनोचिकित्सक ने बच्ची से कई प्रश्न किए, फिर उसे प्यार से समझाया कि शेर तुम्हें सपने में परेशान करता है। बच्ची ने कहा- नहीं। मनोचिकित्सक ने समझाया कि शेर तुम्हें परेशान करने नहीं बल्कि तुमसे दोस्ती करने व तुम्हारा मनोरंजन करने के लिए तुम्हारे सपनों में आता है। क्या शेर ने तुम्हें कभी भी नुकसान पहुंचाया? बच्ची ने कहा- नहीं। बस एक सकारात्मक सोच ने उस बच्ची के जीवन को खुशियों से भर दिया, उसके मन से डर निकल गया।
हमें भी अपना हर पल सकारात्मक सोच के साथ बिताकर अपने जीवन की नकारात्मक सोच को खत्म कर देना चाहिए ताकि हम अपने जीवन को सरलता से जी सकें। हर दिन हमें एक अच्छी-सी सकारात्मक सोच के साथ दिन की शुरुआत करना चाहिए। 
- साधना

Thursday, May 16, 2013

द्रौपदी पांडवों की पत्नी क्यों हुई?

Ram and Sita - home altar


देवी भागवत के नवें स्कन्ध के 14वें अध्याय के अनुसार जब सीता-हरण का समय उपस्थित हुआ तो अग्निदेव ने भगवान श्रीराम से प्रार्थना की कि आप सीताजी को मुझमें स्थापित कर छायामयी सीता को अपने साथ रखिए।
फिर समय आने पर मैं सीताजी को आपको लौटा दूंगा। रावण की मृत्यु के पश्चात जब सीताजी कि अग्नि-परीक्षा हो रही थी, उस समय अग्नि-देव ने वास्तविक सीताजी को उपस्थित कर भगवान श्रीराम को सौंप दिया और छायासीता को श्रीराम व अग्निदेव ने पुष्कर क्षेत्र में जाकर तपस्या करने को कहा।
वही छाया सीता अगले जन्म में राजा द्रुपद के यहाँ यज्ञ-वेदी से द्रौपदी के रूप में प्रकट हुई। भगवान शिव की पूजा में तत्पर छाया सीता ने भगवान त्रिलोचन से प्रार्थना की थी कि मुझे पति प्रदान करें।
यही शब्द उनके मुख से पाँच बार निकले। भगवान महादेव परम रसिक है- उन्होनें प्रसन्न हो कर वर दिया कि तुम्हें पाँच पति मिलेंगे। इस तरह द्रोपदी पाँच पांडवों की पत्नी हुई।
- साधना

Monday, May 13, 2013

अक्षय तृतीया

Lord Vishnu

वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया या आखातीज कहते है। अक्षय का शाब्दिक अर्थ होता है जिसका कभी नाश न हो। स्थायी वही रह सकता है जो सर्वदा सत्य हो।
इसी दिन से त्रेता युग का आरंभ हुआ था। इस तिथि को भगवान बद्रीनाथ के पट भी खुलते है। आज के दिन ही साल भर में एक बार वृन्दावन में श्री बिहारीजी के चरणों के दर्शन होते है।
आखातीज एक सामाजिक पर्व भी है। इस दिन बिना मुहूर्त देखे सभी शुभ कार्य आरंभ किए जा सकते है। आज का दिन हमारे आत्म विश्लेषण करने का दिन है। हमें इस दिन स्वयं का अवलोकन और आत्मविवेचन करना चाहिए। हमें आज के दिन अहंकार, स्वार्थ, काम, क्रोध, लोभ और बुरे विचारों को छोड़कर सकारात्मक चिंतन करना चाहिए जिससे हमें शांति व दिव्य गुण मिल सके। 
इस दिन दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। इस तिथि पर दही, चावल-दूध से बने व्यंजन, खरबूज, तरबूज और लड्डू का भोग लगाकर दान करने का विधान है। 
आज के दिन ही महात्मा परशुरामजी का जन्म हुआ था। वे भगवान विष्णु के अवतार है। रेणुका पुत्र परशुरामजी ब्राम्ह्ण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे। सहस्त्रार्जुन ने उनके पिताजी जमदग्नि का वध कर दिया था, जिससे क्रोध में आकर परशुरामजी ने पृथ्वी को दुष्ट क्षत्रिय राजाओं से मुक्त किया था। भगवान शिव के दिये हुए अमोघ अस्त्र परशु को धारण करने के कारण इनका नाम परशुराम पड़ा था। 
- (धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार)

Sunday, May 5, 2013

अधिक तृष्णा(इच्छा) नहीं करनी चाहिए

Jackal

किसी जंगल में एक भील रहता था। वह बड़ा साहसी और वीर था। वह रोजाना जंगली-जंतुओं का शिकार करके अपने परिवार का पेट भरता था। एक दिन उसे जंगल में एक विशाल सूअर दिखाई दिया। सूअर को देख कर भील ने अपने कान तक धनुष खींच कर उस सूअर पर बाण चलाया। बाण की चोट से सूअर तिलमिला उठा और उसने भील पर हमला कर उसके प्राण ले लिए।
इस प्रकार शिकार और शिकारी दोनों की मर्त्यु हो गई। उसी समय एक भूखा-प्यासा सियार वहाँ आया। सूअर और भील दोनों को मरा हुआ देख कर वह मन ही मन बहुत खुश हुआ और सोचने लगा- मेरी किस्मत बहुत अच्छी है जो मुझे इतना अच्छा भोजन मिला।
इस भोजन का मुझे धीरे-धीरे उपभोग करना चाहिए, जिससे ये बहुत समय तक मेरे काम आ सके। ऐसा सोचकर वह धनुष की डोरी को ही खाने लगा। थोड़ी देर में धनुष की डोरी टूट गई। धनुष टूट कर सियार के मस्तक पर टकराया और सियार के मस्तक को फोड़ कर बाहर निकल गया। अधिक लालच के कारण सियार की पीड़ा-दायक मृत्यु हो गई इसलिए नीति कहती है अधिक लालच नहीं करना चाहिए। 
                                                               - पंचतंत्र की कथा से प्रस्तुत

Friday, April 19, 2013

श्री रामनवमी

Shree Ram Darbar (Lord Rama, Lakshman, Sita & Hanuman)

आज रामनवमी का पर्व है। आप सभी को इस अवसर पर बहुत-२ शुभकामनाएं। इस पर्व के महत्व को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से मैं यह लेख लिख रही हूँ। आशा है यह  लेख आपको पसंद आएगा। अपनी टिप्पणियों (comments) द्वारा अपनी सोच मुझ तक पहुंचाइएगा। 

श्री रामनवमी सारे संसार के लिए सौभाग्य का दिन है क्योंकि इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने रावण के वध, दानवों के विनाश और सनातन धर्म की रक्षा करने के लिए उन्होने धरती पर जन्म लिया था। 

श्रीराम के समान आदर्श पुरुष, पुत्र, शिष्य, पति, वीर, दयालु, सत्यवादी,  दृढ़ प्रतिज्ञ और संयमी जगत के इतिहास में कोई नहीं हुआ। साक्षात परम पुरुष परमात्मा होने पर भी श्रीराम ने सभी को सत्य की राह दिखलाने के लिए आदर्श लीलाएँ की, जिन्हें हम आसानी से अपने जीवन में अपना सकते है। सज्जनों की रक्षा के लिए स्वयं भगवान श्री हरि राम के रूप में अवतीर्ण हुए। 

श्री राम सर्वात्मा है, उनके जीवन का मंत्र था- "सभी को साथ लेकर चलने में ही सच्चा सुख है।" रामनवमी का पर्व हमें संदेश देता है 'अपने को शुद्ध करो ज्ञान की सीमा का विस्तार करो, सद्भाव, समभाव और सहभाव से अपने जीवन को सफल और सार्थक बनाओ।' राम भक्ति में डूबकर राम बन जाओ। स्वयं आनंदित रहकर दूसरों को आनंदित करना ही राम का रामत्व है। 
- साधना

Thursday, April 18, 2013

सर्प-भय मुक्ति मंत्र

Snake Charmers

मैं इस पोस्ट में सर्प-भय से मुक्ति के लिए प्राचीन मंत्र को धर्म ग्रंथ के अनुसार आप सभी तक पहुँचा रही हूँ। ये सभी के लिए ज़रूरी है। 
इस मंत्र के नित्य प्रति जाप करने से सर्प या नागों के भय से मुक्ति मिलती हैं और यह मंत्र विष-भय से हमारी रक्षा करता है।
मंत्र इस प्रकार है: 
जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। 
वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा॥
जरत्कारूप्रियाआस्तीकमाता विषहरेति च।
महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता॥
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत।
तस्य नागभयम् नास्ति तस्य वंशोभ्द्वस्य च॥

अगर आप सभी को यह जानकारी पसंद आए तो जरूर शेयर करें और सभी तक पहुँचाए। 
धन्यवाद। 
- साधना

Thursday, April 11, 2013

वासंतिक नवरात्र


आज चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवसंवत्सर का आरंभ होता है। आप सभी को इस अवसर पर बहुत-२ शुभकामनाएं। इस पर्व के महत्व को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से मैं यह लेख लिख रही हूँ। आशा है यह  लेख आपको पसंद आएगा। अपनी टिप्पणियों (comments) द्वारा अपनी सोच मुझ तक पहुंचाइएगा।

प्रतिपदा तिथि से हिन्दू नववर्ष का आरंभ होता है। इसी तिथि से पितामह ब्रम्हा ने संसार का निर्माण शुरू किया था। इसी दिन राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत की। 

इस नवरात्र में माँ भगवती दुर्गा की विशेष आराधना की जाती है। घट स्थापना के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। पूरे नौ रात्रियों तक पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। अंतिम दिन हवन करके पूर्णाहुति की जाती है। अष्टमी और नवमी को सभी घरों में विशेष पूजा की जाती है। कन्या पूजा नवरात्र का अनिवार्य हिस्सा है। कन्याओं को देवी मानकर उनको भोजन कराकर उनकी पूजा की जाती है। कन्याओं को वस्त्र और फल भेंट किए जाते है।

चैत्र नवरात्र में शक्ति के साथ शक्तिधर की भी पूजा की जाती है। देवी भागवत के साथ ही रामायण का भी पाठ होता है, इसलिए यह नवरात्र,  देवी नवरात्र के साथ-साथ राम नवरात्र के नाम से भी प्रसिद्ध है। 

आज के दिन नए वस्त्र पहनना चाहिए। घर को ध्वज,पताका और बंदनवार से सजाना चाहिए। आज का दिन गुड़ीपड़वा के रूप में भी मनाया जाता है। घर के बाहर रेशमी वस्त्र से गुड़ी बांधी जाती है। इस दिन घरों में पूरणपोली और श्रीखंड बनाया जाता है। आज के दिन नीम के कोमल पत्तों, फूलों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हिंग, जीरा, मिश्री, और अजवाइन डालकर खाना चाहिए। इसे खाने से रक्त संबंधी बीमारियों से बचाव होता है और आरोग्य की प्राप्ति होती है। 

आशा है आपको ये जानकारी पसंद आएगी। धन्यवाद
- साधना

Sunday, March 17, 2013

मूर्ख को उपदेश देना अहितकर होता है

Monkeys in a Lewes Fleamarket

किसी जंगल में एक विशाल शमी का वृक्ष था। उसकी शाखा पर गोरैया का जोड़ा घोंसला बनाकर रहता था। एक दिन आकाश काले बादलों से घिरा था और वर्षा भी हो रही थी। थोड़ी देर में बारिश तेज़ हो गयी और ठंडी हवाएँ चलने लगी। इतने में एक बंदर ठंड से दाँत कटकटाते हुए उस वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया। गोरैया ने बंदर से कहा- तुम दिखते तो मानव जैसे हो, एक घर क्यों नहीं बना लेते, जिससे हर मौसम में तुम्हारी रक्षा हो। 

बंदर को गुस्सा आ गया और वह बोला- तू मेरा मज़ाक उड़ाती है, चुप क्यों नहीं रहती। गोरैया फिर बोली- अगर मकान नहीं बना सकते तो कोई गुफा ही ढूंढ लो ताकि कष्ट से बच सको। इतना सुनते ही बंदर को गुस्सा आ गया और बोला- इतनी छोटी होकर तू मेरा मज़ाक उड़ा रही है। जिस घोंसले पर तुझे अभिमान है, मैं उसे अभी उजाड़ देता हूँ। यह कहकर उसने घोंसले के टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

बेचारी गोरैया तो बंदर को नेक सलाह दे रही थी पर उसे क्या मालूम था कि मूर्खों को सलाह देने का परिणाम भयंकर होता हैं। इसलिए मूर्खों को उपदेश नहीं देना चाहिए क्योंकि उपदेश उनके क्रोध को बढ़ता है और वो गुस्से के कारण ये नहीं समझते कि उपदेश उनकी भलाई के लिए हैं।    
- पंचतंत्र की कथा से प्रस्तुत

Monday, February 25, 2013

खरगोश और मेंढक



honey bunny
खरगोश बहुत दुर्बल और डरपोक प्राणी होते हैं। बलवान जानवर उन्हें देखते ही मारकर खा जाते हैं। इस अत्याचार के कारण खरगोशों ने आपस में सलाह करके निश्चय किया कि हमेशा भयभीत रहकर जीने से अच्छा है कि प्राण त्याग दिये जाएँ। 

ऐसी प्रतिज्ञा करने के बाद सभी खरगोश पास के तालाब में कूदकर प्राण देने की इच्छा से इकट्ठे हुए। तालाब के किनारे पर पहुँचने पर खरगोशों ने देखा तालाब किनारे मेंढक बैठे हुए हैं। खरगोशों के पहुँचते ही सारे मेंढक तालाब में कूद पड़े। 

यह देखकर खरगोशों का नेता बोला- मित्रों! हम लोगों को इतना डरने की और अपने आप को असहाय समझने की ज़रूरत नहीं हैं। कुछ प्राणी ऐसे भी है जो हमसे भी दुर्बल और डरपोक हैं अतः हमें प्राण त्यागने की ज़रूरत नहीं हैं।

इसलिए हमारे जीवन में कितनी भी परेशानी आ जाए हमें निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसे अनेक लोग मिल जाएंगे जिनकी हालत हमसे भी ज्यादा खराब हैं बल्कि हमें कमजोर लोगों के प्रति सद्भावना रखनी चाहिए ताकि हम अपनी कठिनाइयों को भूल कर आगे बढ़ सकें। 
-(संत ईसप की नीतिकथाओं से प्रस्तुत)

Friday, February 15, 2013

बसंत पंचमी महोत्सव

आज बसंत पंचमी का पर्व है। आप सभी को इस अवसर पर बहुत-२ शुभकामनाएं। इस पर्व के महत्व को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से मैं यह लेख लिख रही हूँ। आशा है यह  लेख आपको पसंद आएगा। अपनी टिप्पणियों (comments) द्वारा अपनी सोच मुझ तक पहुंचाइएगा।

माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी का उत्सव मनाया जाता हैं। बसंत पंचमी के आते ही प्रकृति में नए परिवर्तन आने लगते हैं। दिन छोटे होते हैं, ठंड कम होने लगती हैं और पतझड़ शुरू हो जाता हैं। आम की मंजरियों पर भौरें मंडराने लगते है। जीवन में एक नया उत्साह और उमंग महसूस होने लगता हैं। 


इस दिन सरस्वती पूजन का विशेष महत्व हैं। माँ सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी की देवी हैं। भगवान श्री कृष्ण के कंठ से उत्पन्न होने के कारण देवी का नाम सरस्वती हुआ। देवी सरस्वती ने ही संसार को निर्मल ज्ञान देकर इसका निर्माण किया हैं।

इस तिथि पर ही बच्चों का अक्षरज्ञान शुरू किया जाता हैं। पुस्तक और कलम में देवी सरस्वती का वास माना जाता हैं इसलिए पुस्तक और कलम की पूजा की जाती हैं। विद्या को सभी धनों में प्रधान धन कहा गया हैं। विद्या से ही ज्ञान प्राप्त होता हैं। माँ सरस्वती को प्रसन्न करके ही सभी महान ऋषियों ने सिद्धि को प्राप्त किया। विद्यार्थियों को विशेष रूप से माँ सरस्वती को प्रसन्न करना चाहिए ताकि वो अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त कर हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सके।

आशा है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। धन्यवाद
- साधना



Wednesday, February 6, 2013

आलस्य से पतन होता है

Camel at Gaochang
एक ऊँट था, उसे पूर्वजन्म की सारी बातें याद थी। ऊँट होते हुए भी वह तपस्या में लगा रहता था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे वरदान मांगने को कहा। ऊँट ने कहा- भगवान यदि आप प्रसन्न है तो वर दीजिये कि मेरी गर्दन इतनी लंबी हो जाए की मैं एक स्थान पर बैठा-बैठा सौ मील दूर तक का भोजन खा सकूँ। भगवान ने कहा- 'ऐसा ही होगा।' 
अब ऊँट लंबी गर्दन कर बैठे-बैठे अपना भोजन पा लेता था। इस तरह वह आलस्य की मूर्ति बन बैठा। एक दिन ऊँट बहुत दूर देश में चर रहा था। तभी बारिश आने लगी, बारिश से बचने के लिए ऊँट अपनी गर्दन एक गुफा में डालकर चरने लगा। संयोग से उसी गुफा में भूखा सियार का जोड़ा बैठा था, उन्होने ऊँट की गर्दन को काट-काट कर खाना शुरू कर दिया। जब सौ मील दूर बैठे ऊँट को दर्द महसूस हुआ तो वह अपनी गर्दन समेटने लगा, पर ये संभव न हो सका। इस तरह सियार के काट कर खा जाने से ऊँट की मृत्यु हो गयी। 
इसीलिए हमें आलस्य नहीं करना चाहिए और हमेशा कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि आलस्य ही पतन का कारण होता हैं। 
- (महाभारत से प्रस्तुत नीतिकथा)

Friday, January 25, 2013

नीतिकथा (कौवा और मोर के पंख)

   एक कौवा था उसे एक जगह बहुत से मोर के पंख पड़े हुए मिले। कौवे ने सोचा- मैं इन मोर पंखों को अपने पंखों पर लगा लूँ, तो मैं भी मोर के समान सुंदर दिखने लगूँगा। यह सोचकर उसने मोरपंखों को अपने पंखों पर लगा लिया और अन्य कौवों के पास जाकर कहने लगा- तुम लोग बड़े नीच और कुरूप हो, अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा। यह कहकर मोरों की टोली में सम्मिलित होने चला गया। 
मोरों ने उसे देखते ही पहचान लिया और सभी मोरों ने उसके मोर पंख निकाल दिये और उस पर प्रहार करने लगे। कौवे ने भागकर अपनी जान बचाई और फिर कौवों की टोली में शामिल होने चला गया। ठीक उसी तरह कौवों ने भी उसे अपमानित किया और कहा- तू बड़ा नीच और निर्लज्ज है, तूने हमें अपमानित किया। अब तू यहाँ से भी भाग जा और इस तरह उस मूर्ख कौवे को सभी कौवों ने भगा दिया।
   इसलिए दूसरों की नकल का प्रयास छोड़कर अपने गुण-अवगुण जानकर मर्यादा में रहे तो किसी से भी अपमानित नहीं होना पड़ता।



-(संत ईसप की नीतिकथाओं से प्रस्तुत)