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Wednesday, June 12, 2019

अंतिम यात्रा का इंतज़ार....

जब भी उस राह से गुज़रती,
वृद्धाश्रम में वृद्धों को खिलखिलाकर हँसता देखती
लगता वे सभी अपनी दुःखद यादों को भूल जाना चाहते है
उनके झुर्रियों से भरे चेहरे,
मुँह के किनारों से टपकती लार,
काँपते हुए हाथ, 
चल न पाने की विवशता नज़र आती
पर अपने अतीत की यादों में डूबे हुए,
खुश होने का अभिनय करते हुए गुज़ारते अपने वक़्त को,
क्षमा कर देते है वे दिल से,
उनके साथ जो भी गलत व्यवहार हुआ है
और करते अपनी अंतिम यात्रा का इंतज़ार....

-- साधना 'सहज'

Tuesday, April 2, 2019

जिंदगी...

                     
 


जिंदगी देती हैं हमें बहुत प्यारी और खुशनमा चीज़ें,
सुमधुर संगीत समुन्दर की लहरों-सा,
सूरज की तपन के बाद मिट्टी से उठती सौंधी महक,
खुला अनंत तक फैला आसमान,
चहचहाते पक्षी, चाँद-तारों से भरी रात,
नज़र भर कर इन सब खुशनुमा चीज़ों के साथ,
सजाते हम अपने सुनहरे ख्वाब,
क्लेश और कलह से भरे जीवन से तो
बेहतर है प्रकृति का साथ
पलभर के लिए भूलकर
उलझनों से भरे इस जीवन को
झूम उठो प्रकृति के साथ...

-- साधना 'सहज'


Tuesday, November 27, 2018

जब भी छूती हूँ....


जब भी छूती हूँ 
पुराने मिट्टी से बनी अब बदरंग सी हो चुकी घर की दीवारे,
याद आती है मुझे अपने बीते हुए कल की 
और उन पूर्वजों की जिनके सानिध्य में बीता मेरा खुशनुमा जीवन,
नन्हे-नन्हे झरोखे जिनसे हम कूदकर इधर-उधर पार हुआ करते थे,
उन्ही झरोखों से निहारते थे आकाश गंगा को,
 तो कभी सपनो में परियों को,
आज भी वही पवन, पक्षी और चाँद-सूरज है,
जो साक्षी है मेरे बचपन के,
मंद-मंद सुवासित पवन जब मुझे छूती है,
लगता है कोई अपना पास से गुजर गया,
चाँद-सूरज की रौशनी में पूर्वजों के जलाये हुए 
दीपक की झिलमिलाहट नज़र आती है,
पूर्वजों के स्वर मुझे मेरी रचनाओं में आशीर्वाद से नज़र आते है,
जब भी छूती हूँ......... 

--साधना 'सह्ज' 

Tuesday, August 7, 2018

अंतिम समय...

अंतिम समय में जब शरीर शांत-क्लांत होगा,
थक कर पलके निढाल हो बंद हो जाएगी
बंद आँखों के सामने चलचित्र के समान 
गुजरेगी जीवन भर की यात्रा
कि हमने कब भला किया,
कब बुरा किया,
देखे कैसे-कैसे सपने
कब मन बैचैन रहा,
कब हरषाया 
कभी उत्सुकता से भरे पल,
कभी झूठ, नफरत, घृणा से भरे पल
पर सच तो यह है की 
बंद आँखों से निकल पड़ेंगे 
अविरल अश्रु और दिल से सबसे पहले 
समाप्त हो जायेगे जीवन भर के 
झूठ, नफरत और घृणा से भरे पल... 
- साधना 'सहज' 

Friday, April 14, 2017

मुक्ति की चाह


हर पल मुक्ति की तलाश में भटकता मन
कभी पर्वत की गगनचुम्बी शिखर पर,
कभी झिलमिलाते सितारों से भरे आसमान में,
तारों की झंकार सुन भटक जाता मन,
थक जाती रात और झिलमिल सितारे,
सुनकर आहट चहचहाते पक्षियों की लौट जाती रात,
सो जाते सितारे भोर के सूरज के आने से पहले,
मैं अपनी मुक्ति की राह देखती रहती, सुबह की सुनहरी धूप से 
चमकते गगनचुम्बी शिखरों की ओर अपनी बाहें फैलाए...

- साधना 'सहज'

Thursday, April 7, 2016

बेचैन मन...

व्यस्त जीवन के शोर से मन हर पल बेचैन है,
नींद भी आती नहीं, चेतना भी थक-सी जाती,
मन छटपटाता, अँधेरों में रोशनी नज़र आती नहीं,
तपती गर्म रेत-सा मन तपता रहता, 
मृगतृष्णा में भटकता रहता,
पर बारिश की ठंडी फुहारे नज़र आती नहीं,
ठंडी-ठंडी पवन के इंतज़ार में मन हर पल भटकता,
नर्म गीली मिट्टी पर कदमों के निशान,
बनते ही हर पल बिखरे से नज़र आते,
उलझनों से निकलने की चाह में,
मन और भी उलझता जाता... 
- साधना 'सहज' 

Sunday, February 7, 2016

बेटियां...

नील गगन में रोशनी फ़ैलाने वाली,
सुन्दर शीतल चाँद-सी होती है बेटियां,
टिम-टिम करते जगमग सितारों से,
मिलने वाले निर्मल उजास-सी होती है बेटियां,
सूरज की गुनगुनी धूप का एहसास दिला,
रोशनी से मन को भर देती है बेटियां,
मंद-मंद सुवासित पवन की तरह,
हौले-हौले प्रेम से सबके जीवन को भर देती है बेटियाँ,
पूर्वजों के आशीर्वाद से मिलती है बेटियां,
बेटियों बिन जीवन घर आँगन सब सून है,
हर घर का सुखद एहसास है बेटियां...
- साधना 

Friday, January 1, 2016

फिर एक नया साल....

सूरज की परिक्रमा पूरी कर,
365 दिनों में फिर लौट आई पृथ्वी,
लेकर एक नयी उमंग,
उत्साह को साथ लेकर एक नया साल,
नयी अनुभूति, नए अनुभव, 
नयी आकांक्षाओं के साथ,
वही सूरज, वही चाँद होगा,
पर जश्न ज़ोरदार होगा,
नए कैलेंडर के साथ कुछ 
नयी उम्मीदों का जन्म होगा,
असहिष्णुता को छोड़ 
सहिष्णुता का बोलबाला होगा,
 हर दिन सूरज निकले,
अमन-चैन, उम्मीदों का उजाला लेकर,
हम सब करे उसका स्वागत 
नए जोश व जिंदादिली के साथ....
-- साधना   

Friday, December 4, 2015

मेरी मासी...

मासी तुम माँ सी हो,
तुम्हारे निर्मल प्यार में बसता है
हम सबका जीवन,
तुम्हारी उठती-झुकती पलकों में है
जीवन का साँझ-सवेरा,
तुम्हारी ममतामयी मीठी वाणी में है बसी,
शाम को मस्जिद से उठती अजान,
सुबह को पूजा से उठते मंत्रो के स्वर,
जीवन के सारे रिश्ते तुमसे ही,
तुम्ही हो हम सबकी आशा, उम्मीद और विश्वा,
तुमसे मिलकर जीवन में आया नया आत्मविश्वास,
तुम्हारी इबादतों से ही है हम सबका जीवन गुलज़ार...
 - साधना 

Wednesday, September 30, 2015

नारी अधिकार...


नारी तुम कोमल हो, त्याग, पवित्रता, 
ममता की मूरत हो,
प्रेम से हर मन को जीत, 
बड़ी से बड़ी विपदा का सामना करती हो,
अपनी मानसिक शक्ति को दृढ कर, 
तुम जीवन की हर बाधा को हरा देती हो,
अथक परिश्रम से तुम हर राह को
आसान बना देती हो,
लेकिन पुरुष के दैहिक बल के आगे, 
तुम निरीह बन जाती,
तुम्हे अपने अधिकार पूर्ण रूप से 
नहीं देना चाहता ये समाज,
पर अब देना ही होगा समानता का, 
स्वतंत्रता का अधिकार
अन्यथा नारी की तीसरी दृष्टि 
खुलने पर मच जायेगा हाहाकार...
-साधना

Thursday, August 27, 2015

नन्ही खिड़कियाँ

चहार दीवारों से घिरा घर,
ईंट गारे से बना घर, सुन्दर नज़र आता,
घर में कीमती सोफे, झूमर, 
फर्नीचर से अनुपम शोभा बढ़ जाती,
पर सबसे प्यारी होती वे छोटी-छोटी खिड़कियाँ,
जिनसे हरपल खुला भोर का सूरज,
नीला आकाश और ऊँची उड़ान भरता परिंदा नज़र आता,
सुहानी शाम के ढलते ही 
नन्हे झिलमिल सितारे 
और दूधिया रौशनी बिखेरता चाँद नज़र आता,
इन्ही नन्ही नन्ही खिड़कियों से 
सारे संसार का सतरंगी सार नज़र आता...

Monday, July 27, 2015

रंगीन साइकिल


शाम होते ही नन्हे-नन्हे बच्चे सड़को पर,
 दौड़ाते रंगीन साइकिलें,
वहीं सड़क किनारे मटमैले से कपड़े पहनकर,
मज़दूर के बच्चे निहारते 
उन रंगबिरंगी साइकिलों को, 
कभी दौड़ते इस तरफ तो कभी उस तरफ,
नन्हे हाथों से ताली बजा-बजाकर, 
निष्कपट मन से खूब खुश होते, 
उनकी अदा से झलकता उनका भोला बचपन,
वे भी चाहते करना सवारी उस नन्ही साइकिल पर,
पर मन मसोस कर देखते रहते, 
तब उनकी ममतामयी माँ छुपाकर संचय किए धन से
लाकर देती किसी भी तरह पुरानी नन्ही साइकिल और 
खुश हो झूम उठते नन्हे-नन्हे बच्चे... 

Thursday, June 25, 2015

मासूम बच्चे


वे नन्हे बच्चे जो जीवन में कभी नहीं खेल पाते कीमती खिलौनों से,
भूख लगने पर मुट्ठी-भर चने खा, पानी पीकर चुपचाप सो जाते है। 
जिन्हें जीवन में कभी भी तीज-त्योहारों पर नहीं मिल पाते 
कीमती कपडे व तोहफे, 
जिनका सारा संसार छुपा होता है 
उनकी माँ की निश्छल प्रेमपूर्ण हंसी और दुलार में,
अक्सर ऐसे ही बच्चे जीवन की चुनौतियों को स्वीकार कर, 
बड़े होकर बनते है इस संसार में अद्भुत कवि, चित्रकार व महान वैज्ञानिक 
और इस देश के कर्णधार...

Monday, April 27, 2015

अब जाग उठो...



अब जाग उठो धरावासियों, ये धरा तुम्हे पुकार रही,
पुकार रही प्रकृति, मिटा दो इस धरा से गन्दगी का साम्राज्य,
सौगंध उठा लो न रहने देंगे धरती पर गन्दगी, 
न काटेंगे वृक्ष, न उजाड़ेगे घने जंगल, ये बिन मौसम की बारिश, 
कड़कती हुई बिजुरिया,गमी में शीत लहर, 
कही दिल-दहलाने देने वाले भूकंप,
ये परिणाम है इस प्रकृति से मनमाने खिलवाड़ का,
प्रकृति ने सहनशील बन बहुत किया इंतज़ार कि शायद मानव सुधर जाये, 
प्रकृति उतारू है तोड़ने पर अब अपने ही बनाये नियम और बंधन,
अभी भी समय है तुम ना करो अत्याचार,
सुधार कर अपनी आदतें बचा लो 
अपनी आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के कहर से,
उन्हें दो सुन्दर अनमोल प्रकृति का उपहार… 

-साधना 

Tuesday, February 10, 2015

जीवन



जीवन एक खुली किताब है,जिसके हर पन्ने पर एक नया अध्याय है।
जीवन को पढ़ो,सीखो और सहेज कर रखो।
जीवन अनंत है, पवित्र है, उसकी पवित्रता नज़र आती है चारों और फैली हरियाली में,
फूलों में,फसलों में और सुवासित मंद-मंद पवन में।
जीवन मानव को मिला अनमोल उपहार है उसे लगाना होगा असहाय मानव,
जरूरतमंद लोगों और बुजुर्गों कि सेवा करने में उनकी हर जरुरत को पूरा करने में।
मूक पशु-पक्षियों कि देख-रेख में और अन्याय को दूर करने में
ताकि हम सफल बना सकें अपना जीवन...
- साधना 

Wednesday, December 17, 2014

जगत जननी


हे जगत जननी तुम शक्ति हो
शिव के साथ मिल तुम और भी शक्तिशाली हो जाती हो
तुम्हारे हज़ारों हाथ हैं, तुमसे विनम्र विनती है
मुझे मेरे दो हाथों के अतिरिक्त और दो हाथ प्रदान कर दो
क्योंकि, मैं लगन से काम करने के बाद भी किसी भी कार्य में पूर्णता प्राप्त न कर सकी
थक चुकी हूँ, चारों और असंतुष्ट चेहरे नज़र आते हैं
मैं संतुष्ट देखना चाहती हूँ हर चेहरे को
मैं सभी निःशक्त-जनो, जरुरतमंदो की मदद करना चाहती हूँ
और पूर्णता को प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना
समर्पित करना चाहती हूँ, तुम्हारे चरणों में...

 - साधना

Friday, April 25, 2014

दिन ढलने लगा...


















दिन ढलने लगा सूर्यदेव पधारे अस्ताचल को,
शंख की ध्वनि से साँझ का आगमन हुआ,
दमक उठे घर आँगन , तुलसी चौरे पावन दीप के प्रकाश से
पवित्र घण्टियों का नाद हुआ,
उठ गए माँ के पवित्र हाथ विनती के लिए
मद्धम स्वर में प्रार्थना गूंज उठी
हे ,संझा मइया सबका भला करना
हर घर व सारे संसार में सदा सुख-शांति बनाए रखना...
- साधना 

Wednesday, March 19, 2014

खुशी
















Photo taken from: Dhinakaran Gajavarathan's Flickr Photostream

जीवन मे हर पल गमों को
भूलने के लिए भटकते रहे
खुशियाँ ढूंढते रहे
पर खुशियाँ नहीं मिली
परेशान होकर तब पलकें मूंदकर
हम बैठ गए वीराने में
जब चिड़ियों के कलरव से हम जागे
खुशियाँ थी चारों तरफ
सूरज की किरणों में,
चंद्रमा की चाँदनी में,
ठंडी-ठंडी बयार में,
कोयल की कूक में,
ठंडे शीतल जल में,
मयूर के कलात्मक नृत्य में,
चारों तरफ आनंद ही आनंद था,
और हर कोई अपनी-अपनी
तकलीफ़ों को भुला कर
तरह-तरह से खुशियाँ बिखेर,
खुश हो रहा था...
- साधना

Saturday, February 8, 2014

नन्ही चिड़िया














एक काली, चमकीली छोटी सी, चुनमुन चिड़िया
कभी पत्तों पर गिरी पानी की बूंदों पर फिसलती
कभी फूलों में चोंच डाल उनका रस पीती
फिर हौले-हौले पारिजात के पत्तों को ध्यान से देखती
बड़ी मेहनत से कहीं से धागे, नारियल के रेशे लेकर आती
धीरे-धीरे बुनती अपने नन्हें बच्चों के लिए घरौंदा
रुई के नर्म बिछौनों पर देती अंडे
और इंतज़ार करती नाज़ुक परों से ढंके अपने बच्चों का
फिर उनके लिए चुन-चुन के लाती दाना-पानी
उन्हे हर विषम परिस्थिति में उड़ना सिखाती
इतनी छोटी सी होने पर भी
अपना माँ होने का हर कर्तव्य निभाती
इस निर्दयी संसार में रहकर उन्हे मुक्त गगन में
निर्भय होकर जीना सिखाती....
- साधना

Friday, December 27, 2013

ओस की बूँदें...



कुहरे से भरी धुंधली सुबह में,
जब रक्तिम आभा से भरा सूरज निकलता,
तब ओस की नन्ही बूँदें पत्तों के किनारों पर,
मोतियों-सी सज जाती।
जगमगाती सुंदर मोतियों की लड़ी की तरह।
हवा के थपेड़ों को सहकर इधर-उधर,
लुढ़क कर अपने अस्तित्व को बचाती।
किसी उदास मन को जीवन का रहस्य समझाती
कि जब तक हमारा अस्तित्व है,
हमें जीवन की परेशानी को भूलकर ख़ुशी-ख़ुशी जीना होगा।

- साधना