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Wednesday, April 8, 2015

एहसास...


सारा जीवन बीत गया दुनिया भर के रिश्तों,  
रस्मों रिवाज़ों, जिम्मेदारियों को निभाने में
कभी सोच भी न सकी अपने बारे में
आज आँखें बंद कर सोच रही हूँ, मैं कौन हूँ?
शरीर क्या है? हर दिन बदलती त्वचा का बदलाव
पहले नर्म मुलायम सी थी, धीरे धीरे झुर्रियों से भरने लगी है
एहसास होता है हम माटी के पुतले हैं
जो एक दिन धीरे-धीरे माटी में ही मिल जाएँगे...

 - साधना

Tuesday, December 2, 2014

जिंदगी...














सोचा न था जिंदगी इतनी उलझनों से भरी होगी
हर कदम पर मुसीबतें होंगी 
अपनों से इतने गम मिलेगें कि दुश्मनों की जरुरत ही न होगी
जिंदगी का हर लम्हा डर के साए से होकर गुजरता है,
न जाने किस मोड़ पर जिंदगी डगमगा जाये
और कोई अपना दूर तक नज़र न आये
दर्द के सायों में गुम हो ये जिंदगी,
ऐसे ही एक दिन हमेशा के लिए गुजर जाए...
- साधना