कौन कहता है कि
प्रलय का दिन आकर गुज़र गया
प्रलय आया भी तो ऐसे कि
सभ्य समाज की नींव हिल उठी
काँप उठी मानवता
वहशीपन व संस्कारहीन राक्षसों के कुकर्मों से
प्रलय का निशाना बनी एक नाज़ुक प्यारी सी बेटी
अचानक सभी बेटियों के माँ-बाप सहम गए
इस पुरुष प्रधान समाज में
स्त्री का वज़ूद खतरे में है
समाज को पालने वाली स्त्री ही
बेसहारा है, कमजोर है
पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में
स्त्री के वजूद को बचाना होगा
किसी नए प्रलय के आने से पहले
उसका हल निकालना होगा
हर रात के बाद सुबह आती है यही सोचकर
इस समाज को सोते से उठाना होगा
यह प्रलय फिर लौटने का दुस्साहस ना करे
इसीलिए हर स्त्री को तन-मन से सशक्त बनाना होगा
- साधना
सूरज के ढलते ही सड़कों पर स्याह अंधेरा फैल जाता है,
उस अंधेरे में कुछ अजनबी, अटपटे से चेहरे नज़र आते है,
उन अजनबी चेहरों को देख मन संशय में डूब जाता है,
लगता है वो शख्स बुरी भावनाओं से हुमें देख रहा है,
फिर मन कहता है ऐसा नहीं हो सकता,
पर मन सोचने पर मजबूर हो जाता है,
वर्तमान में इंसानियत बची ही कहा हैं?
कब एक सभ्य इंसान हैवान में बदल जाये ये तय नहीं,
इन स्याह अँधेरों से हर इंसान परेशान है,
घर से हँसती-मुसकुरा कर निकली हुई बेटी
क्या सूरज ढलने के बाद सुरक्षित अपने घर को लौट पाएगी?
मन कहता है नहीं, क्योंकि इंसान पर वहशीपन सवार है,
वर्तमान में हमारा विश्वास ही विश्वासघात में बदलने को मजबूर है।
- साधना
कान्हा!
तुम्हारी बांसुरी के स्वर में
निशिगंधा, पारिजात, चमेली सा मीठा सुगंधित स्वर है
ठंडी, लहराती मुक्त पवन सा मोहक व मादक स्वर है
भ्रमरों की मस्त, फक्कड़ सी गुनगुनाहट है
पत्तियों की सरसराहट से उत्पन्न होने वाला स्वर है
अनंत से उठने वाले स्वरों की गूंज है
तुम्हारी बांसुरी के स्वर मेरे जीवन को
उमंग व उल्लास से भर देते हैं
मेरे मन में नई उम्मीदों का संचार करते हैं
सारी तृष्णाओं को मिटाकर
सारे बैर-भाव मिटाकर
नवजीवन की ओर
अनंत के कठिन पथ पर अग्रसर कर
जीवन की हर राह को सरल बना देते हैं
- साधना
नारी तुम शक्ति हो,
घर में हो तो गृहलक्ष्मी, धर्मपत्नी कहलाती हो
संतान की जननी होने से माँ कहलाती हो
कहीं पुत्री, कहीं बहू,
अनंत रूपों को धारण कर
तुम परिवार को, इस संसार को चलाती हो
माँ स्वरूप में अपने बच्चों के
हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की कामना करती हो
सुख-दुख मे उनके साथ रहती हो सदा
संस्कार देकर अच्छे उन्हे सदाचार सिखाती हो
परिवार पर कोई कष्ट न आए इसलिए
पूजा, प्रार्थना, व्रत, उपवास कर
हर अनिष्ट को दूर रखना चाहती हो
तन से भले ही थक जाओ
पर मन से सशक्त हो
परिवार की हर ज़रूरत पूरी करती हो
इस सब पर भी इस कलयुग में
अपयश और अपमान ही तुम्हारे हिस्से आता है
कहने को सबकुछ तुम्हारा होता है
फिर भी तुम सदा खाली हाथ रहती हो
इस समाज से प्रार्थना है मेरी
वे नारी का अपमान ना करें
क्योंकि नारी तुम ही तो
दुर्गा, राधा, लक्ष्मी का रूप हो
- साधना
एक टेढ़ी-मेढ़ी लहराती सी कच्ची-पक्की पगडंडी
थके हुए पथिक की राह को आसान बनाती
सघन जंगल में भूले हुए राही को पथ दिखलाती
ऊंचे पर्वत, नदियों, झरनों के कठिन पथ पर
आसानी से ले जाती
दिन भर के थके-हारे मजदूरों को
उनके घर तक पहुंचाती, वापस ले जाती
घने जंगलों में महुआ, तेंदू बीनने वालों की
राह आसान बनाती
टेढ़ी-मेढ़ी, कच्ची-पक्की होने पर भी
पगडंडी, सभी पथिकों को मंजिल पर पहुंचाती
- साधना
हे कान्हा! जब मन के सारे भाव डूब जाए,
मन की सारी आशाएँ कुम्हला जाए,
तब तुम दया के सागर बन आ जाना,
जब जीवन की सारी मधुरता मरुभूमि में बदलने लगे,
तो तुम मेघ बन जल बरसाना,
जब मन सांसारिक भावों में उलझ जाए,
तब तुम प्रभु शांति का भाव देने चले आना,
जब कोई मेरा अपना न हो,तब मेरे प्यारे प्रभु,
तुम अपने ह्रदय के समीप मुझे बुला लेना,
कान्हा! तुम मेरे जीवन के पथ प्रदर्शक बनकर,
मेरे जीवन रूपी रथ को पार लगा देना,
ताकि मुझे मोक्ष मिल सके व शांति- परमशांति...
-साधना
आकाश अनंत है उस अनंत में चाँद, सूरज
और टिमटिम चमकते बहुत सारे सितारे है,
आकाश की नीली आभा को देख मन प्रफुल्लित हो जाता है,
कभी सिंदूर सा लाल हो मन में उमंग जगाता है,
तो कभी मटमैला-सा होकर निराशा का भाव जगाता है,
आकाश सिर ऊँचा उठाकर जीने की कला सिखाता है,
तमाम भेद-भावों को भुलाकर अपने आप में लीन होना सिखाता है,
मासूम नन्हें बच्चों को परीलोक का आभास दिलाता है,
आकाश में बादलों से बनी आकृतियों को देखकर
बच्चों के मन में जिज्ञासा का भाव जागता है,
वही युवाओं की आँखों में नए-नए स्वप्न जगाता है,
मन को पंछियों की तरह कल्पना की ऊँची उड़ान भरना सिखाता है,
और मोक्ष की इच्छा रखने वाले
बुजुर्गों को शांति का एहसास कराता है...
- साधना