Sunday, May 11, 2014

माँ प्यार तुम्हारा

Manon et Maman

माँ प्यार तुम्हारा निर्मल जलधारा ,कलकल कर बहता जाता 
मेरे जीवन की सारी नीरवता और विषाद को अपने 
संग ले कलकल बहता जाता 
सावन की मस्त फुहारों सा मेरे तन-मन को भिगो जाता 
माँ प्यार तुम्हारा मधुर-मधुर 
तपती धूप में ठंडक पहुँचता 
माँ प्यार तुम्हारा चंदा की निर्मल चाँदनी सा 
थके हुए मन को शांति का एहसास दिलाता 
माँ प्यार तुम्हारा शक्ति बन जीवित होने का एहसास 
दिला सत्य की राह पर चलना सिखलाता 

- साधना 

Thursday, May 1, 2014

कारीगरी के शहंशाह


जब भी सुबह-सुबह उस रास्ते से गुजरती,
बहुत सारे श्रमिक शेड के आसपास नज़र आते,
श्रमिकों के झुण्ड, जो काम मिलने की आशा लिए,
जमा हो जाते गलियों, चौराहों पर,
कभी बतियाते, कभी गुमसुम से नज़र आते। 
मन ही मन सोचते ये गलियाँ चौराहे सदा रौशन रहें, 
ताकि उनका जीवन व रोजी-रोटी चलती रहे। 
वे हर तरह के काम को करने को आतुर होते,
किन्तु ऐसे ही लोगों में कुछ लोग होते बहुत ही हुनरमंद,
क्योंकि उनकी मेहनत छैनी हथोड़ी करनी के भरोसे होती है,
गज़ब की कारीगरी और वे ही होते हैं, 
अनोखी कारीगरी के शहंशाह!!
                                       - साधना 

Friday, April 25, 2014

दिन ढलने लगा...


















दिन ढलने लगा सूर्यदेव पधारे अस्ताचल को,
शंख की ध्वनि से साँझ का आगमन हुआ,
दमक उठे घर आँगन , तुलसी चौरे पावन दीप के प्रकाश से
पवित्र घण्टियों का नाद हुआ,
उठ गए माँ के पवित्र हाथ विनती के लिए
मद्धम स्वर में प्रार्थना गूंज उठी
हे ,संझा मइया सबका भला करना
हर घर व सारे संसार में सदा सुख-शांति बनाए रखना...
- साधना 

Thursday, April 17, 2014

माँ की यादें


















photo taken from: Francois Bester's Flickr Photostream

शांत नीरव निस्तब्ध लम्बी रातों में 
सन्नाटों को चीरती
निशाचर पक्षियों कि चीखती आवाज़ें 
कुत्तों का सस्वर करुण रुदन
एक बूढ़ी माँ के मन को उद्वेलित कर जाता,
बोझिल मन विचारों की दुनिया में खो जाता,
मन की कई खिडकियाँ खुलती-बंद होती रहती 
मन के झरोखों में बंद यादें
आँखों के आगे तैर जाती 
जीवन में बिताए हुए सुख-दुःख के पल याद आते 
आँखों में नीर भर आता 
इन्हीं बीती यादों के सहारे बिताती माँ ,
माँ की ममता को भूल चुके बच्चों से
दूर रह कर अपना शेष जीवन
- साधना 

Wednesday, March 19, 2014

खुशी
















Photo taken from: Dhinakaran Gajavarathan's Flickr Photostream

जीवन मे हर पल गमों को
भूलने के लिए भटकते रहे
खुशियाँ ढूंढते रहे
पर खुशियाँ नहीं मिली
परेशान होकर तब पलकें मूंदकर
हम बैठ गए वीराने में
जब चिड़ियों के कलरव से हम जागे
खुशियाँ थी चारों तरफ
सूरज की किरणों में,
चंद्रमा की चाँदनी में,
ठंडी-ठंडी बयार में,
कोयल की कूक में,
ठंडे शीतल जल में,
मयूर के कलात्मक नृत्य में,
चारों तरफ आनंद ही आनंद था,
और हर कोई अपनी-अपनी
तकलीफ़ों को भुला कर
तरह-तरह से खुशियाँ बिखेर,
खुश हो रहा था...
- साधना

Monday, March 17, 2014

रंग उड़ाती
















रंग उड़ाती, मन को बहलाती
सारे जग को अपने रंग में रंगने होली आई
नीले-पीले, हरे-गुलाबी
कच्चे-पक्के रंगो से भिगोने आई
फागुन के इस रंग में डूबा
टेसू पहन केसरिया बाना
आ धमका प्रकृति को रंगने अपने रंग में
चुलबुल बुलबुल नए राग सुना
सबको खुशियों से भिगोने आई
भूल कर सारे गिले शिकवे
सद्भावनाओं के रंग में रंगने
रंग -बिरंगी होली आई
शोर मचाती, हुल्लड़ करती
मस्तानो कि टोली आई
रंग उड़ाती, मन को बहलाती
रंग-बिरंगी होली आई....
- साधना 

Sunday, March 16, 2014

रंगों का त्यौहार - होली



















बसंतपंचमी के आते ही प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन आने लगता है। दिन बड़े होने लगते हैं, जाड़ा कम होने लगता है और पतझड़ शुरू हो जाता है। माघ पूर्णिमा को होली का डांडा गाड़ा जाता है। आम कि मंजरियों पर भौरें मँडराने लगते हैं, वृक्षों में नई  कोपलें फूटने लगती है, और चारों ओर एक नवीनता का अहसास होने लगता है। ऐसे समय पर मनाया जाता है नई उमंग के साथ, रंगों का त्यौहार होली।

होली एक सामाजिक एवं धार्मिक त्यौहार के साथ-साथ रंगों का भी त्यौहार है। इस अवसर पर लकड़ी और कंडों का ढेर लगा कर होलिकापूजन किया जाता है फिर उसे जलाया जाता है। इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ भी कहा जाता है। खेत से नए अनाज को लाकर होली कि आग में भूनकर प्रसाद के रूप में दिया जाता है, इस अन्न को होला कहते है।

हिरण्यकश्यपु की बहिन होलिका को वरदान मिला था कि उस पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं होगा। अतः वह विष्णुभक्त प्रह्लाद का अंत करने के विचार से उन्हें गोद में लेकर अग्नि के बीच में बैठ गई पर भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका का अंत हुआ। तभी से त्यौहार मनाने की प्रथा चल पड़ी।

होली एक आनंद और उल्लास का पर्व है। यह सम्मिलन, मित्रता व एकता का पर्व है। इस दिन सभी द्वेषभाव भूलकर सबसे प्रेम और भाईचारे से मिलते है। एकता ,सद्भावना एवं भाईचारा बनाये रखना इस त्यौहार का मूल उद्देश्य एवं संदेश है।

इस दिन अबीर -गुलाल लगा कर सभी एक दूसरे से गले मिलते है। कुछ लोग कीचड़ ,गोबर, मिटटी का प्रयोग कर के एक दूसरे के ह्रदय को चोट पहुचातें है। अतः इन सब का त्याग करना चाहिए। इस दिन आम कि मंजरी और चन्दन को मिला कर खाने का माहात्म्य है। जो लोग फागुन कि पूर्णिमा को हिंडोले में झूलते हुए भगवान के दर्शन करते है ,वे बैकुंठलोक में निवास करते है। अतः हम सभी को पूरे उल्लास व उमंग के साथ इस रंगों से भरे त्यौहार को मनाना चाहिए।
- साधना