Tuesday, August 7, 2018

अंतिम समय...

अंतिम समय में जब शरीर शांत-क्लांत होगा,
थक कर पलके निढाल हो बंद हो जाएगी
बंद आँखों के सामने चलचित्र के समान 
गुजरेगी जीवन भर की यात्रा
कि हमने कब भला किया,
कब बुरा किया,
देखे कैसे-कैसे सपने
कब मन बैचैन रहा,
कब हरषाया 
कभी उत्सुकता से भरे पल,
कभी झूठ, नफरत, घृणा से भरे पल
पर सच तो यह है की 
बंद आँखों से निकल पड़ेंगे 
अविरल अश्रु और दिल से सबसे पहले 
समाप्त हो जायेगे जीवन भर के 
झूठ, नफरत और घृणा से भरे पल... 
- साधना 'सहज' 

Saturday, June 30, 2018

कारी बदरिया...

B&W Cumulous Cloud
घनघोर कारी बदरिया तुम छा गयी हो चहुँ ओर 
घुमड़-घुमड़ कर बरसो चहुँ ओर, 
भिगो दो खेत खलिहानों को,
सूखी दरकी जमीन को, 
पैदा कर दो नई आशा उमंगो को,
धरती की कोख़ में छुपे हुए बीजों को अंकुरित कर,
विशाल रेगिस्तान में बरस भिगो दो
उस प्रेम विहीन मन को,
जो मन ही मन प्रेम में भीगना चाहता है पर मौन है,
बुझा दो नफरत,अहंकार और अहम् की जलती लपटों को,
जो अधिकतर दिलों में जल रही है,
फिर से बरस-बरस कर
एहसास पैदा करो जन-मन में जीवित होने का,
घुमड़-घुमड़ के बरसो ना कारी बदरिया... 


-- साधना 'सहज'

Saturday, March 17, 2018

सारी उम्र...

सारी उम्र उपदेशों को सच मानकर जीवन जिया,
कभी किसी का अपमान नहीं किया, 
किसी को जान-बूझकर परेशान नहीं किया,
हर ज़रूरतमंद की मदद की, 
झूठ बोलना स्वीकार नहीं किया, 
सद-विचारों का सम्मान किया,
जन्म के बाद मृत्यु शाश्वत सत्य है ये भी माना,
पर हर पल जीवन में अपमान ही मिला,
मुझे डर लगता है मृत्यु से कही,
उस लोक में भी ऐसे ही लोग ना मिल जाए,
जो अपनों को ही छलते हो, अपमानित करते हो

-- साधना ' सहज '

Wednesday, December 27, 2017

पल-छिन

पल पल छिन-छिन जीवन गुज़र रहा है,
हौले-हौले जीवन का ये साल भी गुज़र रहा है,
बीते लम्हों को भूल ठंडी-ठंडी हवाओं का दामन थाम,
बादलों के दामन में छुपे 
अनमने से सूरज की धूप के इंतज़ार में ये वक़्त गुज़र रहा है। 
अनमनी-सी धूप नए-नए प्रवासी परिंदो का इंतज़ार,
पेड़ो से झरते पुराने पत्तों की सरसरहाट
 को सुन ये वक़्त गुज़र रहा है।  
शाम को गहराते अंधेरों में कुहरे की चादर में लिपट 
सन्नाटों से भरी रातों के साये में ये पल गुज़र रहा है।  
आएगी जीवन में फिर एक खुशनुमा सुबह 
सूरज की लालिमा के साथ यही सोचकर 
ये सोचकर ये जीवन गुज़र रहा है।   
--साधना 'सहज'

Monday, October 16, 2017

श्वेत कुंद...



हर सुबह मेरे दरवाजे पर लगे कुंद श्वेत पुष्प,
मुस्कुराते हुए करते स्वागत हम सबका,
अधखिली कलियों से फैलाते हुए,
सुवासित मंद-मंद सुगंध,
कह उठता कुंद "सुप्रभात",
कामना करते श्वेत पुष्प, 
मंगलमय हो दिन हमारा,
जब उसे मैं जल से सींचती,
तो भरकर नई उत्साह उमंग,
कुंद के श्वेत पुष्प,
भर देते मेरे जीवन में 
अपनी ऊर्जा, उत्साह और उमंग.... 

-- साधना 'सहज' 

Tuesday, July 11, 2017

थक सा गया है चाँद...


बादलो से लुकाछुपी करता थक सा गया है चाँद,
कभी पूर्ण आभा से दमकता दिख जाता,
पल भर में मटमैला-सा हो जाता,
चलता रहता रात-भर सितारों के बीच,
कुछ कहता, कुछ सुनता सा,
इस छोर से उस छोर तक,
चलता रहता बिना आराम किए,
पर भोर के उजियारे के आने पर,
 मुरझा-सा जाता चाँद,
फिर थक कर उषा की झोली में,
पुनरागमन के लिए सो जाता चाँद... 

-- साधना 'सहज' 

Friday, April 14, 2017

मुक्ति की चाह


हर पल मुक्ति की तलाश में भटकता मन
कभी पर्वत की गगनचुम्बी शिखर पर,
कभी झिलमिलाते सितारों से भरे आसमान में,
तारों की झंकार सुन भटक जाता मन,
थक जाती रात और झिलमिल सितारे,
सुनकर आहट चहचहाते पक्षियों की लौट जाती रात,
सो जाते सितारे भोर के सूरज के आने से पहले,
मैं अपनी मुक्ति की राह देखती रहती, सुबह की सुनहरी धूप से 
चमकते गगनचुम्बी शिखरों की ओर अपनी बाहें फैलाए...

- साधना 'सहज'