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Tuesday, April 2, 2019

जिंदगी...

                     
 


जिंदगी देती हैं हमें बहुत प्यारी और खुशनमा चीज़ें,
सुमधुर संगीत समुन्दर की लहरों-सा,
सूरज की तपन के बाद मिट्टी से उठती सौंधी महक,
खुला अनंत तक फैला आसमान,
चहचहाते पक्षी, चाँद-तारों से भरी रात,
नज़र भर कर इन सब खुशनुमा चीज़ों के साथ,
सजाते हम अपने सुनहरे ख्वाब,
क्लेश और कलह से भरे जीवन से तो
बेहतर है प्रकृति का साथ
पलभर के लिए भूलकर
उलझनों से भरे इस जीवन को
झूम उठो प्रकृति के साथ...

-- साधना 'सहज'


Tuesday, July 11, 2017

थक सा गया है चाँद...


बादलो से लुकाछुपी करता थक सा गया है चाँद,
कभी पूर्ण आभा से दमकता दिख जाता,
पल भर में मटमैला-सा हो जाता,
चलता रहता रात-भर सितारों के बीच,
कुछ कहता, कुछ सुनता सा,
इस छोर से उस छोर तक,
चलता रहता बिना आराम किए,
पर भोर के उजियारे के आने पर,
 मुरझा-सा जाता चाँद,
फिर थक कर उषा की झोली में,
पुनरागमन के लिए सो जाता चाँद... 

-- साधना 'सहज' 

Thursday, March 21, 2013

पतझड़

Autumn in Novosibirsk
पेड़ों के पत्ते झड़ गए पतझड़ का आव्हान हुआ,
सूरज की तपती किरणों ने गर्मी का आव्हान किया,
पशु-पक्षी सब घबरा उठे, ताल-तलैया लगे सूखने,
बढ़ती गर्मी की तपन ने पंखों व ए.सी. का आव्हान किया,
सारा दिन भट्टी-सा तपता, लू ने सभी को परेशान किया,
सब डरते-डराते घर में छुपते, हर कोई हैरान हुआ,
सांझ के ढलते ही छत पर पहुँच हर व्यक्ति ने,
चंद्रमा की शीतल किरणों व मंद पवन का आव्हान किया।
पेड़ों के पत्ते झड़ गए...
- साधना