Friday, August 12, 2016

सुबह होते ही...


सुबह होते ही सड़कों पर कामवाली बाइयों की आवाजाही नज़र आती,
उनकी सुबह ही बर्तन साफ़ करने व झाड़ू पोंछे से होती,
सड़क पर भी वे सोचती-विचारती सी नज़र आती,
उन्हें हर पल जल्दबाजी होती,
झटपट सारा काम पूरा कर घर पहुँचती,
लेकिन घर पहुँचने पर वही शराबी पति से झिकझिक, 
टूटी खटिया, रोते बीमार बच्चे, 
झोपड़ी से रिसता पानी नज़र आता,
दिनभर की परेशानियों से तन-मन से थक उदास हो जाती,
रात को सोते वक्त ही महसूस कर पाती,
वह अपनी सांसों का स्पंदन और जीवित होने का अहसास...

-- साधना

Friday, May 20, 2016

सिंहस्थ कुंभ महापर्व



दुनिया के मानचित्र में एक निश्चित स्थान पर,
जहाँ से गुज़रती कर्क रेखा पर बसा एक शांत शहर, 
जो इस वक़्त महाकाल की नगरी के 
साथ-साथ मायानगरी सा नज़र आता।
चारों और आस्था, भक्ति का अलौकिक दृश्य नज़र आता,
क्षिप्रा नर्मदा के पावन संगम के कारण 
और भी पवित्रता का एहसास दिलाता।
चारों और फहराती रंग-बिरंगी ध्वजाएँ,
महाकाल के मंदिर का स्वर्ण मंडित कलश,
और पताकाओं को छूती सूरज की किरणों से जगमग सा नज़र आता।
कही जलते कंडों के बीच धुनी रमाते साधु,
शंख बजाते भक्त, कभी त्रिशूल, कभी डमरू,
हर हर महादेव की आवाज़ों से गूंजते घाट, 
हर ओर देशी-विदेशी भक्तों का ताँता नज़र आता।
शाही स्नान पर महामंडित गुरुओ, नागा साधुओं का शाही स्नान,
शाही जुलूसों का वैभव अपनी अनुपम छटा बिखेरता,
तपती धुप में आस्था से भरे श्रद्धालु डुबकियां लगाते नज़र आते।
सांझ होते ही अनुपम विद्युत साज-सज्जा से 
दमकते घाट, मंदिर, आश्रम और शहर निराला नज़र आता।
आकाश चाँद-सितारों से भर रात्रि के आने का एहसास दिलाता,
पर लगता है मानो शहर सोना ही भूल गया है,
क्योंकि हर श्रद्धालु अमृतमयी कुंड में डूबकर
अमृतमयी हो जाना चाहता हो 

- साधना 'सहज'

Thursday, April 7, 2016

बेचैन मन...

व्यस्त जीवन के शोर से मन हर पल बेचैन है,
नींद भी आती नहीं, चेतना भी थक-सी जाती,
मन छटपटाता, अँधेरों में रोशनी नज़र आती नहीं,
तपती गर्म रेत-सा मन तपता रहता, 
मृगतृष्णा में भटकता रहता,
पर बारिश की ठंडी फुहारे नज़र आती नहीं,
ठंडी-ठंडी पवन के इंतज़ार में मन हर पल भटकता,
नर्म गीली मिट्टी पर कदमों के निशान,
बनते ही हर पल बिखरे से नज़र आते,
उलझनों से निकलने की चाह में,
मन और भी उलझता जाता... 
- साधना 'सहज' 

Sunday, February 7, 2016

बेटियां...

नील गगन में रोशनी फ़ैलाने वाली,
सुन्दर शीतल चाँद-सी होती है बेटियां,
टिम-टिम करते जगमग सितारों से,
मिलने वाले निर्मल उजास-सी होती है बेटियां,
सूरज की गुनगुनी धूप का एहसास दिला,
रोशनी से मन को भर देती है बेटियां,
मंद-मंद सुवासित पवन की तरह,
हौले-हौले प्रेम से सबके जीवन को भर देती है बेटियाँ,
पूर्वजों के आशीर्वाद से मिलती है बेटियां,
बेटियों बिन जीवन घर आँगन सब सून है,
हर घर का सुखद एहसास है बेटियां...
- साधना 

Friday, January 1, 2016

फिर एक नया साल....

सूरज की परिक्रमा पूरी कर,
365 दिनों में फिर लौट आई पृथ्वी,
लेकर एक नयी उमंग,
उत्साह को साथ लेकर एक नया साल,
नयी अनुभूति, नए अनुभव, 
नयी आकांक्षाओं के साथ,
वही सूरज, वही चाँद होगा,
पर जश्न ज़ोरदार होगा,
नए कैलेंडर के साथ कुछ 
नयी उम्मीदों का जन्म होगा,
असहिष्णुता को छोड़ 
सहिष्णुता का बोलबाला होगा,
 हर दिन सूरज निकले,
अमन-चैन, उम्मीदों का उजाला लेकर,
हम सब करे उसका स्वागत 
नए जोश व जिंदादिली के साथ....
-- साधना   

Monday, December 21, 2015

काली रातें...

स्याह घनी काली रातों में, 
सुनसान गलियों में,
सन्नाटों को चीरती भयावह आवाज़े,
शायद किसी निर्भया की हो,
पर क्या फर्क पड़ता है?
दिन के उजालो में न्याय मिलता है अपराधी को, 
जेल की सलाखें नहीं
खुले-आम घूमने की आज़ादी
शायद अब स्याह काली रातों की जरूरत ही न हो, 
बेख़ौफ़ घूमते मिल जाये दरिंदे दिन के उजालो में, 
हर गली हर मोड़ पर... 
- साधना 

Friday, December 4, 2015

मेरी मासी...

मासी तुम माँ सी हो,
तुम्हारे निर्मल प्यार में बसता है
हम सबका जीवन,
तुम्हारी उठती-झुकती पलकों में है
जीवन का साँझ-सवेरा,
तुम्हारी ममतामयी मीठी वाणी में है बसी,
शाम को मस्जिद से उठती अजान,
सुबह को पूजा से उठते मंत्रो के स्वर,
जीवन के सारे रिश्ते तुमसे ही,
तुम्ही हो हम सबकी आशा, उम्मीद और विश्वा,
तुमसे मिलकर जीवन में आया नया आत्मविश्वास,
तुम्हारी इबादतों से ही है हम सबका जीवन गुलज़ार...
 - साधना