Thursday, November 13, 2014

तमस से भरी रात













तमस से भरी, लम्बी रात के बीत जाने के बाद 
सृष्टि करती लालिमा से भरे सूर्य के उदय होने का इंतजार 
नन्ही बुलबुल, अलसाते पशु-पक्षी, विशाल वृक्ष,
नाजुक लताएँ तकती रहती सूर्य की और,
सूर्य कुछ अनमना हो निकल पड़ता 
बादलों की ओट से फिर धीरे-धीरे धधकती अग्नि का गोला बन 
चारों और फैला देता नवजीवन का प्रकाश 
पर आकाश में सूर्य सदा अकेला अनमना सा रहता 
उसके धधकते मन में सदा बना रहता गहन अंधकार 
- साधना 

Sunday, October 26, 2014

ऐ माटी के नन्हें दीप...












अमावस के काले अंधकार को दूर करने के लिए,
ऐ माटी के नन्हें दीप तू जगमग-जगमग जल,
नन्ही-सी बाती संग नेह का तेल लिए तू जगमग-जगमग जल,
हर अन्तर्मन में कर प्रकाश, 
दूर कर हर जीवन से अज्ञान अभाव तू जगमग-जगमग जल, 
हर अज्ञानी मूढ्मति मानव के जीवन को प्रकाशित कर उसका पथ प्रदर्शन,
तमस मिटा हर जीवन से आलोकित कर बिखरा ज्योति-किरणे,
जगमग-जगमग उजियारे की हर सीढ़ी पर चल कर प्रकाशित मानव जीवन,             तू भूला पुरानी परेशानियाँ सब संग हिलमिल दिखा सतरंगी सपने...
- साधना

Thursday, October 2, 2014

स्त्रियाँ




भोर के सूरज की लालिमा से चुरा कर लाल मोहक रंग 
एक स्त्री भर लेती अपनी माँग में 
और भर जाती एक नयी उमंग उत्साह और स्फूर्ति से 
हर दिन माथे पर बड़ी सी बिंदी,
हाथों में रंग-बिरंगी खनखनाती चूड़ियाँ, 
गले में मंगलसूत्र ,पैरों में रुनझुन करती पायल-बिछिया 
संपूर्ण श्रृंगार में डूब भूल जाती सारे दुःख-दर्द 
पूर्ण रूप से परिवार के लिए समर्पित होने के बाद भी 
अधिकतर उपेक्षा, अपमान का शिकार होती स्त्रियाँ 
फिर भी, सारे गिले-शिकवे भूल 
हर सुबह सूरज की लालिमा से चुरा कर लाल रंग 
नयी आशा का दामन थाम 
माँग भर लेती स्त्रियाँ... 
- साधना 

Wednesday, September 3, 2014

सावन की घटाएँ...


सावन की घटाओं से घिरे बादलों से झरते पानी में
लोक गीत गुनगुनाती औरतें, धान के खेतों में
झुक कर परहा लगाती, रंग-बिरंगी घुटनों तक लिपटी साड़ियों में
मिटटी से सने हाथों से धान रोपती, साँझ ढलने पर चूल्हे से जूझ
खाना पकाती, घर परिवार की हर जरुरत को पूरा करती
फिर थक कर सोते वक्त देखती सोने के दानों से भरी
सुनहरी लहलहाती फसलों के स्वप्न... 
- साधना 

Saturday, August 9, 2014

नन्हा-सा घर...















रोजगार की तलाश में गाँव से शहर आये हुए लोग सड़क किनारे,
नीले गगन के तले रंग-बिरंगे प्लास्टिक व बाँस-बल्ली के सहारे 
बनाते एक नन्हा-सा घर...
नन्हा-सा ही सही पर घर को
सुविधा युक्त बनाने की कोशिश होती उनकी, 
भीषण गर्मी में बल्ली के सहारे लटका पंखा, 
गैस चूल्हा, छोटा सा टीवी 
नन्हा-सा घर आबाद रहता खिलखिलाते खेलते बच्चों से... 
आशा, उम्मीद, प्यार व परस्पर विश्वास के सहारे 
गुलजार रहता उनका घर 
उन्हें न भविष्य की चिंता, न चोरी का डर, 
न ही घर के टूटने का डर यदि तोड़ भी दिया गया 
तो फिर नई जगह पर उसी हौसलें के साथ 
उम्मीदों का दामन थामे सड़क किनारे 
वे फिर बना लेगें अपना एक नया घर...  
- साधना 

Saturday, July 19, 2014

चंचल मन...

























ए चंचल मन तू स्थिर हो जगा ऐसा भाव मन में,
मैं स्वयं प्रभु रंग में रंग जाऊँ
प्रभु का नाम जप मैं स्वयं शिव हो जाऊँ,
सहजता बस जाये मेरे जीवन में
और मैं स्वयं सहज रूप से शिव हो जाऊँ
भूल माया मोह का बंधन,
भूल तमस को माया मोह के
अथाह सागर से सहज रूप से पार हो जाऊँ
इन्द्रियों की चाहना को भूल परमात्मा के प्रेम रंग में सदा के लिए रंग जाऊँ...
- साधना 

Thursday, June 19, 2014

प्रवासी पक्षी















 प्रवासी पक्षी ,रुको अभी न जाओ छोड़कर क्योंकि मैं तुमसे बात करना चाहती हूँ
जानना चाहती एक राज कि तुम बिना थके कैसे तय करते हो इतने लम्बे फासले
मैं तुम्हें दिखाना चाहती हूँ मेरे रेत से बने घर ,कलकल बहती नदी ,पुरानी पगडण्डी
जिन पर चल कर हर भूला -भटका थका-हारा राही घर पहुँचता है
तुम्हें अनेकों शुभकामनाओं के साथ बिदा कर ,चाहती हूँ तुमसे एक वचन
अगली बार तुम मुझसे मिलने जरुर आओगे तब फिर हम तुम होंगें
एक साथ इस मुक्त गगन के तले...
- साधना