प्राचीन इमारतें खंडहर-सी नज़र आती,
सूरज के निकलते ही सुनहरी आभा वाली,
किरणों का प्रकाश पड़ते ही इमारतें फिर जीवंत हो उठती,
महलों के महराबों झरोखो से आती,
रोशनी व ताजी बयार को महसूस कर लगता,
अभी-अभी महलों के दालानों में राजा का दरबार सजा है,
कहीं से हँसी ठिठोली करती रानियाँ व,
राजकुमारियों की पायल की रुनझुन,
मंद-मंद हँसने खिलखिलाने की आवाज़ महसूस होती,
कहीं सैनिको की आवाजाही तो कहीं,
घोड़ों-हाथियों से सजी सेना का एहसास होता,
कभी ढ़ोल-नगाड़ो की आवाज़ आती,
कहीं घोड़े की टापों की आवाज़ सुनाई देती,
रात की मधुर चाँदनी में एक सुंदर सी,
नर्तकी का आसपास होने का एहसास होता,
घुंघुरुओ की मधुर आवाज व तबले, सारंगी,
शहनाई के स्वर सुनाई देते,
मन इन प्राचीन इमारतों के वैभवपूर्ण इतिहास,
की कल्पनाओं में इसी तरह खो जाता...
- साधना
माँ इस धरती पर मैं खाली हाथ ही आया था,
तुम्हारे ममता भरे आँचल में छुप कर,
मैंने सच्चा प्यार पाया था,
तुमसे महकी मेरे इस जीवन की बगिया,
जीवन के सारे रिश्ते तुमसे हैं,
इस जीवन की खुशी, चिंता, हल्ला-गुल्ला,
तनहाई तुम हो, नदिया, झरने, गहरा समंदर,
सावन-भादों, बसंती बयार तुम ही हो,
जीवन की हर सच्चाई तुम हो,
तुम से ही है रिश्ते-नाते, मेरे जीवन की तुम्हीं विधाता,
तुमसे ही अस्तित्व है मेरा,
तुम हो मेरी प्यारी माँ...
- साधना
मन कभी हँसता, कभी रोता, कभी गाने को करता,
इस मन की गहराई में कुछ जरूर ऐसा है जो ये हर पल,
भटकता रहता दिखावे के लिए हँस -हँस कर सबसे बातें करता,
पर अन्तर्मन से एक थकी हुई सी सांस लेता,
कभी बाज के पंजो में फंसी हुई चिड़िया-सा छटपटाता,
कभी चिंता और दुख की आँधी में फंस जाता,
मन की इस छटपटाहट को दूर करने के लिए,
जब एक आशा की धूमिल-सी किरण नज़र आती,
तब मन सारे दर्द भूल जाता,
मन की बगिया में हजारों रंग-बिरंगे फूल खिल जाते,
मन भोरों की गुनगुनाहट से भर जाता,
फिर अपनी निराशा को दूर करने के लिए,
एक नयी फूलों की बगिया सजाता...
- साधना