Wednesday, December 27, 2017

पल-छिन

पल पल छिन-छिन जीवन गुज़र रहा है,
हौले-हौले जीवन का ये साल भी गुज़र रहा है,
बीते लम्हों को भूल ठंडी-ठंडी हवाओं का दामन थाम,
बादलों के दामन में छुपे 
अनमने से सूरज की धूप के इंतज़ार में ये वक़्त गुज़र रहा है। 
अनमनी-सी धूप नए-नए प्रवासी परिंदो का इंतज़ार,
पेड़ो से झरते पुराने पत्तों की सरसरहाट
 को सुन ये वक़्त गुज़र रहा है।  
शाम को गहराते अंधेरों में कुहरे की चादर में लिपट 
सन्नाटों से भरी रातों के साये में ये पल गुज़र रहा है।  
आएगी जीवन में फिर एक खुशनुमा सुबह 
सूरज की लालिमा के साथ यही सोचकर 
ये सोचकर ये जीवन गुज़र रहा है।   
--साधना 'सहज'

Monday, October 16, 2017

श्वेत कुंद...



हर सुबह मेरे दरवाजे पर लगे कुंद श्वेत पुष्प,
मुस्कुराते हुए करते स्वागत हम सबका,
अधखिली कलियों से फैलाते हुए,
सुवासित मंद-मंद सुगंध,
कह उठता कुंद "सुप्रभात",
कामना करते श्वेत पुष्प, 
मंगलमय हो दिन हमारा,
जब उसे मैं जल से सींचती,
तो भरकर नई उत्साह उमंग,
कुंद के श्वेत पुष्प,
भर देते मेरे जीवन में 
अपनी ऊर्जा, उत्साह और उमंग.... 

-- साधना 'सहज' 

Tuesday, July 11, 2017

थक सा गया है चाँद...


बादलो से लुकाछुपी करता थक सा गया है चाँद,
कभी पूर्ण आभा से दमकता दिख जाता,
पल भर में मटमैला-सा हो जाता,
चलता रहता रात-भर सितारों के बीच,
कुछ कहता, कुछ सुनता सा,
इस छोर से उस छोर तक,
चलता रहता बिना आराम किए,
पर भोर के उजियारे के आने पर,
 मुरझा-सा जाता चाँद,
फिर थक कर उषा की झोली में,
पुनरागमन के लिए सो जाता चाँद... 

-- साधना 'सहज' 

Friday, April 14, 2017

मुक्ति की चाह


हर पल मुक्ति की तलाश में भटकता मन
कभी पर्वत की गगनचुम्बी शिखर पर,
कभी झिलमिलाते सितारों से भरे आसमान में,
तारों की झंकार सुन भटक जाता मन,
थक जाती रात और झिलमिल सितारे,
सुनकर आहट चहचहाते पक्षियों की लौट जाती रात,
सो जाते सितारे भोर के सूरज के आने से पहले,
मैं अपनी मुक्ति की राह देखती रहती, सुबह की सुनहरी धूप से 
चमकते गगनचुम्बी शिखरों की ओर अपनी बाहें फैलाए...

- साधना 'सहज'

Tuesday, December 20, 2016

नंगे पाँव ...

नंगे पाँव चलना अब भूल चुका इंसान,
नन्हे से पैरों ने जब डगमग हो रखा था पहला कदम,
घर-आँगन में गाँवो की गलियों, चौबारों, पगडंडियों में,
लटपट हो दौड़ा था बचपन, नर्म मुलायम दूब पर हुआ था,
मखमली कालीन का एहसास, 
पैरों में चुभती रेत, कंकरीले पत्थर कराते थे,
जीवन में ऊँच-नीच का एहसास,
अब हर समय जूते-चप्पल पहन भाव-विहीन हो मानव,
कर नहीं पता जीवन की सत्यता का एहसास

-साधना 'सहज'

Friday, October 14, 2016

हरसिंगार के फूल...




भोर का सूरज निकलने से पहले
 मैं कुछ जल्दबाज़ी में हूँ,
मैं चुन लेना चाहती हूँ पेड़ पर लगे
हरसिंगार के सिन्दूरी आभा से भरे महकते फूल 

बिखरकर हवा के झोंकों से उड़कर 
धरती पर फैलने से पहले,
स्मृतियों को भरना चाहती हूँ,
हरसिंगार के फूलों की भीनी-भीनी महक से सदा के लिए... 

- साधना सहज

Friday, September 2, 2016

मेरे पापा

मेरे पापा की स्मृति में... 
पापा के साथ बिताये हर पल को याद कर,
मन अतीत की यादों में डूब जाता,
याद आता हर वो लम्हा,
जब हमारी हर ख़ुशी के लिए अपने आप को भूल,
हम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार हो जाते थे पापा,
कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराकर हौसला बढ़ाते थे,
पर तब हम समझ नहीं पाते थे उनके अंतर्मन की बातें,
छोटी-छोटी उपलब्धियों पर भी,
पीठ थपथपा कर आगे बढ़ने का देते थे आशीर्वाद,
पर आज जब भी कुछ लिखती हूँ,
मन मसोस कर रह जाती हूँ,
काश मेरी छोटी-छोटी रचनाओं को पढ़ पाते मेरे पापा 

-- साधना सहज