Showing posts with label नीतिकथा. Show all posts
Showing posts with label नीतिकथा. Show all posts

Thursday, December 12, 2013

संगठन में शक्ति होती है

Elephants by the roadside

किसी वन में एक वृक्ष पर गौरैया का एक जोड़ा रहता था। कुछ समय बीतने पर गौरैया ने अंडे दिए, अभी अण्डों से बच्चे निकल भी नहीं पाये थे कि एक मतवाले हाथी ने आकर उस डाली को ही तोड़ डाला जिस पर घोंसला बना था।

गौरैयाका जोड़ा तो किस्मत से बच गया ,पर सारे अंडें फूट गए। गौरैया का जोड़ा दुखी हो रोने लगा, तब पास बैठे कठफोडवा ने उनके दुःख का कारण पूछा। गौरैया ने घौसला हाथी द्वारा तोड़े जाने की बात बताई। कठफोड़वा ने सांत्वना देते हुए कहा "यूँ तो हम हाथी के सामने छोटे से है परन्तु संगठन में शक्ति होती है हम मिलकर हाथी से बदला ले सकते है।"

तब कठफोडवा अपनी मित्र मक्खी व मेंढक के पास गया व हाथी को पराजित करने कि योजना बनाई। योजनानुसार जब हाथी वहाँ से गुजरा तो मक्खी हाथी के कान के पास गुनगुनाने लगी ,हाथी ने मस्ती में आकर अपनी आँखे बंद कर ली। कठफोडवे ने अपनी तेज चोंच से हाथी कि आँखे फोड़ डाली,अँधा हाथी प्यास से व्याकुल हो उठा। तभी मेंढक एक बड़े से गड्ढें के पास जाकर टर्र -टर्र कि आवाज करने लगा। हाथी पानी के भरम में गढ्ढे में जा गिरा और तड़प -तड़प कर मर गया।

अतः नीति बताती है कि समूह में शक्ति होती है। संगठन और समूह -भावना से कार्य करने से बड़े से बड़ा काम सम्भव हो जाता है, और संतोष भी प्राप्त होता है।

- नीतिकथा से प्रस्तुत

टिप्पणी: वर्तमान समय में हमारे परिवार और हमारे राष्ट्र को भी संगठन व समूह-भावना की आवश्यकता है ताकि हम अपने विरोधियों का सामना सशक्त होकर कर सकें और अपने राष्ट्र को मजबूत बना सके।

Thursday, September 12, 2013

मित्र की पहचान

Wrestling with a trained bear / Lutte avec un ours dressé

दो मित्र थे। एक दिन दोनों भ्रमण के लिए निकले। सँयोगवश उसी समय वहाँ एक भालू आ गया। एक मित्र भालू को देखते ही अत्यन्त भयभीत हो कर, दूसरे मित्र की परवाह किये बिना ही भाग कर निकट के पेड़ पर चढ़ गया। दूसरा मित्र अकेले भालू के साथ लड़ना असम्भव जानकर मुर्दे के समान धरती पर सो गया।

उसने पहले से सुन रखा था कि भालू मरे हुए आदमी को हानि नहीं पहुँचाता है। भालू ने आकर उसके नाक, कान, मुख, आँख, तथा सीने की परीक्षा की और उसे मरा हुआ समझ कर चला गया।

भालू के जाने के बाद पहला मित्र पेड़ से नीचे उतरा। उसने मित्र से जाकर पूछा -भाई ,भालू तुम्हारे कान में क्या कह रहा था। मैंने देखा कि वह बड़ी देर तक तुम्हारे कान से अपना मुख लगाये हुए था। दूसरा मित्र बोला -भालू मुझे यह कह गया कि 
"जो मित्र संकट के समय छोड़ कर भाग जाता है उसके साथ फिर कभी भी मित्रता नहीं रखना चाहिए।"
- नीतिकथा से प्रस्तुत

Sunday, August 4, 2013

चिरकारी की कथा

The Thinker

महर्षि गौतम का एक महान ज्ञानी पुत्र था। उसका नाम था चिरकारी। वह किसी भी कार्य को करने से पहले उस पर देर तक विचार किया करता था। सोचने की आदत के कारण हर काम में देर हो जाती थी, इसलिए लोग उसे आलसी व मंदबुद्धि कहते थे।

एक दिन की बात है, महर्षि गौतम की स्त्री से एक महान अपराध हो गया। जब ऋषि को पता चला तो वे बहुत कुपित हुए और अपने पुत्र को कहा कि ''बेटा, तू अपनी दुष्कर्मा माता का वध कर डाल।" इस प्रकार बिना विचार किय, ऋषि अपने पुत्र को आदेश देकर स्वयं वन को चले गए।

चिरकारी ने बहुत अच्छा कह कर पिता की आज्ञा को स्वीकार कर लिया। पर अपने स्वभाव के अनुसार वह सोचता रहा। उसने सोचा पिता की आज्ञा का पालन करूँ या माता की रक्षा। पिता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का परम धर्म है और माता की रक्षा करना भी प्रधान धर्म है। उसे कभी पिता का पक्ष उचित लगता तो कभी माता का पक्ष। चिरकारी इसी उलझन में पड़ा रहा।

उधर वन में जब ऋषि का क्रोध शांत हुआ तो उन्हें अपने अनुचित निर्णय पर बहुत पछतावा हुआ, वे पत्नी की वध की कल्पना कर रो पड़े। मन ही मन पछताने लगे कि ''आज मेरे अविवेक ने महान अनर्थ कर डाला ,मेरी पत्नी तो निर्दोष है। फिर उन्हें अपने पुत्र के स्वभाव का ध्यान आया। वे सोचने लगे यदि मेरे पुत्र ने आज विलम्ब किया होगा तो मैं स्त्री-हत्या के दोष से बच जाउँगा। जब वे आश्रम पहुंचे तो पुत्र को खड़ा पाया, चिरकारी ने हथियार फेंक कर पिता के चरणों को पकड़ लिया और आज्ञा के पूर्ण न कर पाने की क्षमा मांगी। इतने में ऋषि ने अपनी पत्नी को आते देखा। पत्नी को देख गौतम ऋषि की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रही।

उन्होने पुत्र को गले से लगा कर कहा "बेटा तुम्हारे स्वभाव के कारण मैं महान अनर्थ से बच  गया।" तब ऋषि ने नीति का उपदेश देते हुए कहा "हर कार्य को बहुत सोच-समझ कर करना चाहिए। चिरकाल तक सोच-समझ कर किया हुआ काम हमेशा अच्छा फल ही देता है।
- नीतिकथा से प्रस्तुत

Tuesday, July 2, 2013

युक्ति शारीरिक बल से श्रेष्ठ होती है

King Cobra

किसी वन में एक विशाल बरगद का पेड़ था। उसकी घनी शाखाओं पर अनेक पक्षी रहते थे। वहीं एक कौवे का जोड़ा भी रहता था। उसी पेड़ के खोखले तने में एक काला साँप भी रहता था। जब भी मादा कौवा अंडे देती, वह साँप उन्हें खा जाता था। कौवे के अंडे खा जाना उसका स्वभाव बन गया था। एक दिन कौवे का जोड़ा अपने मित्र सियार के पास गया और अपना दुखड़ा सुनाया। सारी बातें सुनकर सियार भी बहुत दुखी हुआ और बोला - "मित्र, चिंता करने से कुछ नहीं होगा। हम उस दुष्ट सर्प से शारीरिक बल से तो नहीं जीत पाएंगे, पर उपाय करने से तुम्हारा शत्रु मारा जाएगा।" कौवे के जोड़े ने कहा- "मित्र जल्दी से उपाय बताओ"। सियार ने कहा "तुम किसी राजा की राजधानी में चले जाओ, वहाँ से किसी धनी व्यक्ति का सोने का हार लाकर उस दुष्ट सर्प के बिल में डाल देना। उस हार को ढूंढते-ढूंढते राज-सेवक आएँगे और इस प्रकार तुम्हारा दुश्मन मारा जाएगा"।

यह सुनकर कौवे का जोड़ा नगर की और उड़ गया। वहां तालाब के किनारे राजकुमारी जल-क्रीड़ा कर रही थी। कौवे ने झपट्टा मार कर सोने का हार उठा लिया और ले जाकर पेड़ के खोखले तने में डाल दिया और खुद दूसरे पेड़ पर जा कर बैठ गया। राज-कर्मचारिओं  ने कौवे को हार खोखले तने में डालते देख लिया था। जब वे वहाँ पहुचें तो उन्हें फ़न उठाये सर्प दिखाई दिया। फिर क्या था उन सभी ने मिल कर सर्प को मार डाला। सियार के बुद्धि-चातुर्य से कौवे का जोड़ा सुखी हो कर आनन्द पूर्वक रहने लगा।

इसीलिये कहा गया है कि "बलवान को युक्ति से ही जीतना चाहिए"।

- पंचतंत्र से प्रस्तुत 

Tuesday, May 28, 2013

तृष्णा (लोभ) से अधिक इच्छा नहीं करना चाहिए...

पूर्व काल की बात है, एक मुनि थे। उनके मन में धन की इच्छा जाग उठी। धन जमा करने के लिए वे तरह-तरह के प्रयत्न किया करते परंतु उनका हर प्रयत्न विफल हो जाता।
उनके पास का धन भी खत्म होने लगा था। उन्होनें सोचा जो थोड़ा-सा धन बचा है इससे दो बछड़े खरीद लिए जाए फिर खेती करके खूब धन कमाया जाए। उन्होनें ऐसा ही किया, बछड़े खरीद कर सोचा इन बछड़ो से जुताई का काम ले कर खूब अनाज पैदा कर के बहुत सारा धन कमाऊँगा।
फिर वे बछड़ो को परस्पर जोत कर (साथ में बांधकर) हल चलाने की शिक्षा देने के लिए घर से निकल पड़े। जब गाँव से बाहर निकले तो रास्ते के बीच में एक ऊँट रास्ता घेर कर बैठा था। दोनों बछड़े ऊँट को बीच में कर उसके ऊपर से निकलने लगे, किन्तु ज्यों ही उसकी गर्दन के पास पहुँचें तो ऊँट को बड़ी चुभन मालूम हुई।वह रोष में भरकर हड़बड़ा कर उठ खड़ा हो गया। दोनों बछड़े जो परस्पर बंधे हुए थे ऊँट के दोनों ओर लटक गए। बछड़ों की साँसे रुक गयी और वो मर गए। यह दृश्य मुनि अपनी आँखों के सामने देख रहे थे पर उनके वश में कुछ भी नहीं था।
अतः वे तृष्णा(लोभ) से मुख मोड़कर बोल पड़े- "मनुष्य कितना भी बुद्धिमान क्यूँ न हो पर जो उसके भाग्य में नही है, उसे वो किसी भी प्रयत्न् से प्राप्त नहीं कर सकता, हठपूर्वक किए गए पुरषार्थ से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।"
(नीतिकथाओं से प्रस्तुत)
- साधना

Sunday, May 5, 2013

अधिक तृष्णा(इच्छा) नहीं करनी चाहिए

Jackal

किसी जंगल में एक भील रहता था। वह बड़ा साहसी और वीर था। वह रोजाना जंगली-जंतुओं का शिकार करके अपने परिवार का पेट भरता था। एक दिन उसे जंगल में एक विशाल सूअर दिखाई दिया। सूअर को देख कर भील ने अपने कान तक धनुष खींच कर उस सूअर पर बाण चलाया। बाण की चोट से सूअर तिलमिला उठा और उसने भील पर हमला कर उसके प्राण ले लिए।
इस प्रकार शिकार और शिकारी दोनों की मर्त्यु हो गई। उसी समय एक भूखा-प्यासा सियार वहाँ आया। सूअर और भील दोनों को मरा हुआ देख कर वह मन ही मन बहुत खुश हुआ और सोचने लगा- मेरी किस्मत बहुत अच्छी है जो मुझे इतना अच्छा भोजन मिला।
इस भोजन का मुझे धीरे-धीरे उपभोग करना चाहिए, जिससे ये बहुत समय तक मेरे काम आ सके। ऐसा सोचकर वह धनुष की डोरी को ही खाने लगा। थोड़ी देर में धनुष की डोरी टूट गई। धनुष टूट कर सियार के मस्तक पर टकराया और सियार के मस्तक को फोड़ कर बाहर निकल गया। अधिक लालच के कारण सियार की पीड़ा-दायक मृत्यु हो गई इसलिए नीति कहती है अधिक लालच नहीं करना चाहिए। 
                                                               - पंचतंत्र की कथा से प्रस्तुत

Sunday, March 17, 2013

मूर्ख को उपदेश देना अहितकर होता है

Monkeys in a Lewes Fleamarket

किसी जंगल में एक विशाल शमी का वृक्ष था। उसकी शाखा पर गोरैया का जोड़ा घोंसला बनाकर रहता था। एक दिन आकाश काले बादलों से घिरा था और वर्षा भी हो रही थी। थोड़ी देर में बारिश तेज़ हो गयी और ठंडी हवाएँ चलने लगी। इतने में एक बंदर ठंड से दाँत कटकटाते हुए उस वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया। गोरैया ने बंदर से कहा- तुम दिखते तो मानव जैसे हो, एक घर क्यों नहीं बना लेते, जिससे हर मौसम में तुम्हारी रक्षा हो। 

बंदर को गुस्सा आ गया और वह बोला- तू मेरा मज़ाक उड़ाती है, चुप क्यों नहीं रहती। गोरैया फिर बोली- अगर मकान नहीं बना सकते तो कोई गुफा ही ढूंढ लो ताकि कष्ट से बच सको। इतना सुनते ही बंदर को गुस्सा आ गया और बोला- इतनी छोटी होकर तू मेरा मज़ाक उड़ा रही है। जिस घोंसले पर तुझे अभिमान है, मैं उसे अभी उजाड़ देता हूँ। यह कहकर उसने घोंसले के टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

बेचारी गोरैया तो बंदर को नेक सलाह दे रही थी पर उसे क्या मालूम था कि मूर्खों को सलाह देने का परिणाम भयंकर होता हैं। इसलिए मूर्खों को उपदेश नहीं देना चाहिए क्योंकि उपदेश उनके क्रोध को बढ़ता है और वो गुस्से के कारण ये नहीं समझते कि उपदेश उनकी भलाई के लिए हैं।    
- पंचतंत्र की कथा से प्रस्तुत

Monday, February 25, 2013

खरगोश और मेंढक



honey bunny
खरगोश बहुत दुर्बल और डरपोक प्राणी होते हैं। बलवान जानवर उन्हें देखते ही मारकर खा जाते हैं। इस अत्याचार के कारण खरगोशों ने आपस में सलाह करके निश्चय किया कि हमेशा भयभीत रहकर जीने से अच्छा है कि प्राण त्याग दिये जाएँ। 

ऐसी प्रतिज्ञा करने के बाद सभी खरगोश पास के तालाब में कूदकर प्राण देने की इच्छा से इकट्ठे हुए। तालाब के किनारे पर पहुँचने पर खरगोशों ने देखा तालाब किनारे मेंढक बैठे हुए हैं। खरगोशों के पहुँचते ही सारे मेंढक तालाब में कूद पड़े। 

यह देखकर खरगोशों का नेता बोला- मित्रों! हम लोगों को इतना डरने की और अपने आप को असहाय समझने की ज़रूरत नहीं हैं। कुछ प्राणी ऐसे भी है जो हमसे भी दुर्बल और डरपोक हैं अतः हमें प्राण त्यागने की ज़रूरत नहीं हैं।

इसलिए हमारे जीवन में कितनी भी परेशानी आ जाए हमें निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसे अनेक लोग मिल जाएंगे जिनकी हालत हमसे भी ज्यादा खराब हैं बल्कि हमें कमजोर लोगों के प्रति सद्भावना रखनी चाहिए ताकि हम अपनी कठिनाइयों को भूल कर आगे बढ़ सकें। 
-(संत ईसप की नीतिकथाओं से प्रस्तुत)

Wednesday, February 6, 2013

आलस्य से पतन होता है

Camel at Gaochang
एक ऊँट था, उसे पूर्वजन्म की सारी बातें याद थी। ऊँट होते हुए भी वह तपस्या में लगा रहता था। उसकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे वरदान मांगने को कहा। ऊँट ने कहा- भगवान यदि आप प्रसन्न है तो वर दीजिये कि मेरी गर्दन इतनी लंबी हो जाए की मैं एक स्थान पर बैठा-बैठा सौ मील दूर तक का भोजन खा सकूँ। भगवान ने कहा- 'ऐसा ही होगा।' 
अब ऊँट लंबी गर्दन कर बैठे-बैठे अपना भोजन पा लेता था। इस तरह वह आलस्य की मूर्ति बन बैठा। एक दिन ऊँट बहुत दूर देश में चर रहा था। तभी बारिश आने लगी, बारिश से बचने के लिए ऊँट अपनी गर्दन एक गुफा में डालकर चरने लगा। संयोग से उसी गुफा में भूखा सियार का जोड़ा बैठा था, उन्होने ऊँट की गर्दन को काट-काट कर खाना शुरू कर दिया। जब सौ मील दूर बैठे ऊँट को दर्द महसूस हुआ तो वह अपनी गर्दन समेटने लगा, पर ये संभव न हो सका। इस तरह सियार के काट कर खा जाने से ऊँट की मृत्यु हो गयी। 
इसीलिए हमें आलस्य नहीं करना चाहिए और हमेशा कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि आलस्य ही पतन का कारण होता हैं। 
- (महाभारत से प्रस्तुत नीतिकथा)