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Sunday, May 25, 2014

जेठ की तपती दोपहर...

















जेठ की तपती दोपहर में सूरज की किरणें,
प्रचंड रूप धर झुलसा रही जन -जीवन को,
गर्म हवाएँ उड़ा रही धूल और बवंडर,
पृथ्वी के गर्भ में छुपी अनंत ऊष्मा परिणीत हो,
गुलमोहर और अमलतास के चटख रंगो से,
कर रही प्रकृति का मनभावन श्रृंगार।
पशु -पक्षी हाँफ रहे ,नन्ही चिरैया कांप रही
न दाना न पानी दिखता, न नदी न तालाब,
सारा दिन घर भट्टी सा तपता ,कोई न घर के बाहर दिखता
दिन भर की तपन के बाद रातें भी बैचैन करती
पर धीरे-धीरे चन्द्रमा की शीतल किरणें,
दिलाती तपते तन-मन को शीतलता का अहसास...
- साधना 

Saturday, February 8, 2014

नन्ही चिड़िया














एक काली, चमकीली छोटी सी, चुनमुन चिड़िया
कभी पत्तों पर गिरी पानी की बूंदों पर फिसलती
कभी फूलों में चोंच डाल उनका रस पीती
फिर हौले-हौले पारिजात के पत्तों को ध्यान से देखती
बड़ी मेहनत से कहीं से धागे, नारियल के रेशे लेकर आती
धीरे-धीरे बुनती अपने नन्हें बच्चों के लिए घरौंदा
रुई के नर्म बिछौनों पर देती अंडे
और इंतज़ार करती नाज़ुक परों से ढंके अपने बच्चों का
फिर उनके लिए चुन-चुन के लाती दाना-पानी
उन्हे हर विषम परिस्थिति में उड़ना सिखाती
इतनी छोटी सी होने पर भी
अपना माँ होने का हर कर्तव्य निभाती
इस निर्दयी संसार में रहकर उन्हे मुक्त गगन में
निर्भय होकर जीना सिखाती....
- साधना

Saturday, May 18, 2013

संध्या (साँझ)

kwsunset1
धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा,
शांत झील में कुछ नावें तैर रही थी,
तभी लगा सुंदर-सलोनी सी संध्या कुछ अलसाई सी,
थकी-सी, पहनकर सिंदूरी कुछ मटमैली सी,
चमकीली सी साड़ी उतर गयी शांत झील के शीतल जल में,
मैं भी शीतल जल में डूब अपनी थकान मिटाना चाहती थी,
पर ऐसा न हो सका क्योंकि मैं इस जग की थकान से परेशान थी,
संध्या रात भर डूबी रही शीतल जल में करती रही जल-क्रीड़ा करती रही,
सुबह-सुबह चिड़ियों के कलरव से,
ठंडे-ठंडे जल से अपने नयनों को धोकर लजाती,
बलखाती फिर अपनी सिंदूरी साड़ी की,
अलौकिक छटा को बिखराती झील के जल से निकली संध्या,
उज्ज्वल प्रकाश फैला इस सृष्टि को जगमगाने के लिए... 
- साधना

Wednesday, April 24, 2013

मन की छटपटाहट...

Heart Shaped Flowers
मन कभी हँसता, कभी रोता, कभी गाने को करता, 
इस मन की गहराई में कुछ जरूर ऐसा है जो ये हर पल,
भटकता रहता दिखावे के लिए हँस -हँस कर सबसे बातें करता, 
पर अन्तर्मन से एक थकी हुई सी सांस लेता,
कभी बाज के पंजो में फंसी हुई चिड़िया-सा छटपटाता,
कभी चिंता और दुख की आँधी में फंस जाता, 
मन की इस छटपटाहट को दूर करने के लिए,
जब एक आशा की धूमिल-सी किरण नज़र आती,
तब मन सारे दर्द भूल जाता,
मन की बगिया में हजारों रंग-बिरंगे फूल खिल जाते,
मन भोरों की गुनगुनाहट से भर जाता,
फिर अपनी निराशा को दूर करने के लिए,
एक नयी फूलों की बगिया सजाता...
- साधना 

Monday, March 18, 2013

पलाश के फूल

गर्मी का मौसम आते ही,
खिल उठते है चटख रंग के पलाश के फूल,
मन और आँखें तृप्त हो जाती है फूलों को देखकर,
जीवन खुशी से सराबोर हो जाता,
हर पल उत्साह के साथ बासन्ती खुशियाँ मनाता,
भौरों की गुनगुनाहट और चिड़ियों की चहचहाहट को देख वृक्ष भी लहराता,
झूम-झूम कर हर आने-जाने वाले पंछी से बतियाता,
पर जब भी अपनी शाखों को पर्ण-विहीन पाता,
कुछ उदास सा हो जाता,
पर अपने आप को समझता कि खुशी के साथ गम,
मिलन के साथ जुदाई जुड़ी हुई है।
तभी एक नया पंछी डाल पर बैठ कर चहचहाता
और पलाश अपना गम भूल जाता...
- साधना

Friday, November 16, 2012

मुक्ति बन्धन

मेरे घर में एक सुंदर सुनहरा सा पिंजरा है  
उसमे एक प्यारा सा चिड़ियों का जोड़ा है
दोनों चिड़िया दिन भर फुदकती, झूलती, चहचहाती, 
अच्छा सा दाना-पानी खाती पीती और मस्ती में डूब जाती,
पिंजरे में अपने पंखों को फड़फड़ाती,
मुक्त होने की चाह में इधर-उधर पिंजरे से टकराती,
मैंने उन्हे बहुत समझाया, बाहर की दुनिया बहुत निर्मम है,
वहाँ न दाना है न पानी, चारों तरफ दुश्मन ही दुश्मन व परेशानियाँ है,
पर  जब भी मौका मिलता, मुक्त होने की चाह में,
पिंजरा खुलते ही फुर्र हो जाती...
मुक्त गगन में अपना अस्तित्व बनाने की चाह में उड़ जाती...

- साधना