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Monday, December 2, 2013

पुण्य सलिला नर्मदा

Fast flowing river
अमरकंटक के घने जंगलों से,
पर्वतों से निकलते समय तक,
हे पुण्य सलिले नर्मदा,
तुम कितनी शांत और सौम्य होती हो,
धीरे-धीरे लहराती बलखाती,
चट्टानों से टकरा टकरा कर,
अपने पथ को विशाल बनाकर अपने चौड़े पाटों का विस्तार कर,
जन-जीवन की प्यास बुझा निर्झर हो झर-झर आगे बहती जाती,
कहीं धुँआधार का रूप धर लेती,
तो कभी सुन्दर मनोहारी घाटों की अनुपम शोभा बढ़ाती
तुम्हारी उपजाऊ कोख में न जाने कितने जीवन पलते,
जब घुमड़ घुमड़ काले बादल आते,
घनघोर घटाएँ जल बरसातीं,
तब विकराल रूप धर तुम न जाने गाँव,
शहर व प्राणियों को लील आगे बढ़ जातीं,
धीरे-धीरे तुम अशांत समुद्र में मिल गुम हो जातीं,
जहाँ तैरते अनगिनत जहाज...
                                                                           -- साधना 

Wednesday, July 10, 2013

जल-प्रलय

while going to kedarnath-- INDIA

विशाल पर्वत खंड-खंड हो
बह गए जल प्रलय के साथ,
स्तब्ध रह गयी दुनिया
देख प्रलय का हाल,
प्रकृति मौन रह सहती रही
सदियों से मानव का हर मजाक,
कहीं पेड़ों की अंधाधुंध
कटाई कहीं पर्वतों की छँटाई,
कभी धरती का सीना चीरती सुरंगें,
परिवर्तन कर विकास करने की जिद,
परिवर्तन आया आसान हुई हर राह,
मानव खुद को समझ बैठा भगवान,
पर प्रकृति और न सह सकी ये क्रूर मजाक,
उसकी छटपटाती आत्मा व नयनों से निकली जल-धारा
रौद्र रूप रख बह चली, ले विनाश का रूप,
पल भर में चारों और वीरानगी छा गई,
अपने, अपनों से सदा के लिए बिछुड़ गए,
कुछ राजा थे, रंक हो गए,
लाशों से पट गयी देवभूमि,
बिन बताए आये प्रलय ने कर डाला सर्वनाश,
प्रकृति बिन मांगे ही
सहज भाव से हमें देना चाहती थी प्यार-दुलार,
पर स्वार्थी मानव अपनी हठ में समझ न सका
प्रकृति का निर्मल प्यार-दुलार...

- साधना