Thursday, October 2, 2014

स्त्रियाँ




भोर के सूरज की लालिमा से चुरा कर लाल मोहक रंग 
एक स्त्री भर लेती अपनी माँग में 
और भर जाती एक नयी उमंग उत्साह और स्फूर्ति से 
हर दिन माथे पर बड़ी सी बिंदी,
हाथों में रंग-बिरंगी खनखनाती चूड़ियाँ, 
गले में मंगलसूत्र ,पैरों में रुनझुन करती पायल-बिछिया 
संपूर्ण श्रृंगार में डूब भूल जाती सारे दुःख-दर्द 
पूर्ण रूप से परिवार के लिए समर्पित होने के बाद भी 
अधिकतर उपेक्षा, अपमान का शिकार होती स्त्रियाँ 
फिर भी, सारे गिले-शिकवे भूल 
हर सुबह सूरज की लालिमा से चुरा कर लाल रंग 
नयी आशा का दामन थाम 
माँग भर लेती स्त्रियाँ... 
- साधना 

Wednesday, September 3, 2014

सावन की घटाएँ...


सावन की घटाओं से घिरे बादलों से झरते पानी में
लोक गीत गुनगुनाती औरतें, धान के खेतों में
झुक कर परहा लगाती, रंग-बिरंगी घुटनों तक लिपटी साड़ियों में
मिटटी से सने हाथों से धान रोपती, साँझ ढलने पर चूल्हे से जूझ
खाना पकाती, घर परिवार की हर जरुरत को पूरा करती
फिर थक कर सोते वक्त देखती सोने के दानों से भरी
सुनहरी लहलहाती फसलों के स्वप्न... 
- साधना 

Saturday, August 9, 2014

नन्हा-सा घर...















रोजगार की तलाश में गाँव से शहर आये हुए लोग सड़क किनारे,
नीले गगन के तले रंग-बिरंगे प्लास्टिक व बाँस-बल्ली के सहारे 
बनाते एक नन्हा-सा घर...
नन्हा-सा ही सही पर घर को
सुविधा युक्त बनाने की कोशिश होती उनकी, 
भीषण गर्मी में बल्ली के सहारे लटका पंखा, 
गैस चूल्हा, छोटा सा टीवी 
नन्हा-सा घर आबाद रहता खिलखिलाते खेलते बच्चों से... 
आशा, उम्मीद, प्यार व परस्पर विश्वास के सहारे 
गुलजार रहता उनका घर 
उन्हें न भविष्य की चिंता, न चोरी का डर, 
न ही घर के टूटने का डर यदि तोड़ भी दिया गया 
तो फिर नई जगह पर उसी हौसलें के साथ 
उम्मीदों का दामन थामे सड़क किनारे 
वे फिर बना लेगें अपना एक नया घर...  
- साधना 

Saturday, July 19, 2014

चंचल मन...

























ए चंचल मन तू स्थिर हो जगा ऐसा भाव मन में,
मैं स्वयं प्रभु रंग में रंग जाऊँ
प्रभु का नाम जप मैं स्वयं शिव हो जाऊँ,
सहजता बस जाये मेरे जीवन में
और मैं स्वयं सहज रूप से शिव हो जाऊँ
भूल माया मोह का बंधन,
भूल तमस को माया मोह के
अथाह सागर से सहज रूप से पार हो जाऊँ
इन्द्रियों की चाहना को भूल परमात्मा के प्रेम रंग में सदा के लिए रंग जाऊँ...
- साधना 

Thursday, June 19, 2014

प्रवासी पक्षी















 प्रवासी पक्षी ,रुको अभी न जाओ छोड़कर क्योंकि मैं तुमसे बात करना चाहती हूँ
जानना चाहती एक राज कि तुम बिना थके कैसे तय करते हो इतने लम्बे फासले
मैं तुम्हें दिखाना चाहती हूँ मेरे रेत से बने घर ,कलकल बहती नदी ,पुरानी पगडण्डी
जिन पर चल कर हर भूला -भटका थका-हारा राही घर पहुँचता है
तुम्हें अनेकों शुभकामनाओं के साथ बिदा कर ,चाहती हूँ तुमसे एक वचन
अगली बार तुम मुझसे मिलने जरुर आओगे तब फिर हम तुम होंगें
एक साथ इस मुक्त गगन के तले...
- साधना 

Thursday, June 5, 2014

प्यारी कोयल

























एक प्यारी काली कोयल जो है तन से काली पर वाणी से मधुर -मधुर
मचा रही आम की घनी डालियों के इर्द-गिर्द कुहू -कुहू का शोर 
अचानक चुप हो कर जागती सबके मन में विस्मय 
सबकी निगाहें ढूंढती उसे
चंहुँ और छोटे -छोटे बच्चे व्याकुल हो
मचाने लगते कुहू-कुहू का शोर 
सयानी कोयल डालियों पर फुदक -फुदक कर लेती छुपने का मजा 
फिर मौन तोड़कर सुनाती नयी अदाओं से
इठला -इठला कर अपना नया तराना,
मोह लेती सबके मन को अपनी मोहक आवाज से 
और सभी डूब जाते कुहू-कुहू के मस्त राग में 
- साधना 

Sunday, May 25, 2014

जेठ की तपती दोपहर...

















जेठ की तपती दोपहर में सूरज की किरणें,
प्रचंड रूप धर झुलसा रही जन -जीवन को,
गर्म हवाएँ उड़ा रही धूल और बवंडर,
पृथ्वी के गर्भ में छुपी अनंत ऊष्मा परिणीत हो,
गुलमोहर और अमलतास के चटख रंगो से,
कर रही प्रकृति का मनभावन श्रृंगार।
पशु -पक्षी हाँफ रहे ,नन्ही चिरैया कांप रही
न दाना न पानी दिखता, न नदी न तालाब,
सारा दिन घर भट्टी सा तपता ,कोई न घर के बाहर दिखता
दिन भर की तपन के बाद रातें भी बैचैन करती
पर धीरे-धीरे चन्द्रमा की शीतल किरणें,
दिलाती तपते तन-मन को शीतलता का अहसास...
- साधना