आया बसंत, छाया बसंत,
गुनगुनाया निसर्ग
धरती ने ओढ़ी चुनर नई,
कहीं पीली कहीं चटक हरी,
बुलबुल चहकी कोयल कूकी,
कलियों ने घूँघट के पट खोले,
भौंरा हो मदमस्त, गुनगुनाता फिरता,
कभी कुंद तो कभी गुलाब का रस पीता
नन्ही तितली पंख पसारे उड़ती फिरती,
कभी लाल नीले पीले फूलों को तकती
फसलें हवा के झोंकों से,
लरज -लरज लहराती
चटकीली सोने सी चमचमाती धूप,
मन में उत्साह-उमंग जगाती
गुदगुदा जाता हर कवि मन को बसंत,
हर प्रेमी के मन में आस जगाता
प्रस्फुटित हो जाते सुर सारे,
प्रकृति स्वयं राग बसंत गुनगुनाती
आया बसंत छाया बसंत...
- साधना
निश्छल हो बहता झरना,
कल-कल बहता जाता,
कठोर पर्वतों को भेद बहता,
कुछ भेद भरी बातें कहता जाता,
कुछ अनकही बातें सुनता जाता,
जब झूमकर बारिश आती,
झर-झर बहता जाता।
ऊँचें-नीचे अटपटे पथ पर,
जंगल-जंगल बहता जाता।
पशु-पक्षी धरा-अम्बर को जलमय करता जाता
मानव मन को आनन्दित करता जाता।
धीमे-धीमे मधुर-मधुर
अपनी धुन में बहता जाता।
कई छोटी-छोटी धारों के साथ
जा नदिया में समाता।
अंततः नदिया संग सागर में मिल अपनी मंजिल पाता.
- साधना
बारिश की फुहारों से
भीगी धरती में
चारों ओर नए-नए अंकुर फूट रहे हैं।
हरियाली अपना साम्राज्य फैला
बन बैठी है धरती की महारानी
बूढ़ा नीम अंतिम पड़ाव पर सोच रहा है,
कल मैं रहूँ न रहूँ
मुझे काट-पीट कर,
कुछ शाखाओं को जलाया जाएगा,
कुछ से किसी की घर की चौखट बन जाऊंगा,
कहीं किसी बीमार की दवाई बन जाऊंगा,
हर पल किसी के काम ही आऊँगा
फिर भी हर पल अपने नए रूप में,
मैं देख सकूँगा पृथ्वी का नित नया श्रृंगार …
- साधना
मेरा पागल मन जो उड़ा करता है
सुनहरे पंखो पर होकर सवार,
आकाश को छू कर, फिर ज़मी पर भी चलता है
सबसे आगे भीड़ में बार-बार,
आसमान से जमीं तक की ऊँचाइयों को
बार-बार नाप कर बन जाता है इस प्रकृति का राज़दार
सूरज, चाँद, सितारों को हमजोली बना
उनके साथ करता कही अनकही बातें,
कभी हमजोली बन खेलता, कभी झगड़ता, कभी मान भी जाता
चांदनी रातो में सो कर खो जाता सुनहरे सपनो में,
सुबह होने पर सूरज गुदगुदा कर उठाता,
देखने के लिए फिर से नए स्वपन
और जानने के लिए नए-नए राज़…
- साधना